google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: सितंबर 2019

शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

पितृ रहस्यम्-भाग 2

यह पितृ अपने स्वजनों द्वारा किये गये कर्मों को भी भोगते हैं। उनके द्वारा अपने पूर्वजों के निमित्त किये गये दान से जिस को भी तृप्ति मिलती है वो जो आशीष प्रदान करता है वो पित्रों द्वारा भोगा जाता है और इस आनंद को पाकर पितृदेव अपनी संतानों के दुखों को दूर करते हैं।
पितृ आवश्यक नहीं कि मानव का ही रूप लें वो कोई भी शरीरधारी हो सकते हैं वंशजों के पितृ कर्म पित्रों को विभिन्न रूपों में प्राप्त होता है। काग यानी कौवे की पूजा के पीछे यह विधान है कि मृतात्मा सबसे पहले कौवे का ही रूप लेती है।
ऐसा माना जाता है कि आत्मा जब इस शरीर को छोड़कर जाती है तो वो शरीर से निकलते हुए नाभि में जाती है जहां वो रजत रज्जू यानी चांदी की रस्सी से बंधे को खोलकर सूक्ष्म शरीर से पार होकर देह छोड़कर चली जाती है। मृत देह जब जलाया जाता है तब पवित्र अग्रि इस सूक्ष्म शरीर को देवलोक की ओर ले जाती है जिसका मंत्रों में भी उल्लेख किया जाता है पर यदि मोहवश आत्मा इस सूक्ष्म शरीर से पार होने के बजाये इसे लेकर निकल जाती है तो ऐसे में आत्मा अत्यधिक शक्तियों से संपन्न हो जाती है जिससे वो परकाया प्रवेश तक कर सकती है। योगी लोग इसी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से विश्वभ्रमण कर सकते हैं।
पितृदेव के निमित्त किये जाने वाले कर्मों से उनको शांति मिलती है या नहीं इसको लेकर एक किस्सा सुनाया जाता है। ये कितना प्रामाणिक है इस को लेकर कोई प्रमाण नहीं है।
बताया जाता है कि एक बार हनुमान प्रसाद पोत्दार मुंबई गए थे। जहां उन्हें एक आत्मा मिली और कहा कि वो गयाजी में जाकर उसके निमित्त श्राद्धकर्म कर दें तो उसे मुक्ति मिल जाएगी। श्री पोत्दार ने ऐसा ही किया। कुछ समय बाद वो मुंबई फिर गये यह देखने कि आत्मा का हुआ क्या कहते हैं आत्मा उनके पास आई और बताया कि उसे मोक्ष हो गया है और वो अब जा रही है। कहते हैँं उसके बाद वो आत्मा फिर कभी नहीं आई।
ऐसा कहा जाता है कि अगर कोई अपने पित्रों की शांति के निमित्त कुछ भी नहीं करता तो उसे श्राद्धपक्ष से पंद्रह दिन पूर्व से और अंत के बाद पंद्रह दिन दिनों तक विशेष कष्टों का सामना करना पड़ता है जिसमें गृह कलह, क्लेश आदि होते हैं और मन उद्वेलित होता रहता है। लोग पित्रों के निमित्त श्राद्ध सहित कई धार्मिक कृत्यों को आयोजित करते है पर इसका यह अर्थ नहीं है कि आप धनपति हैं तो ही श्राद्ध की पात्रता रखते हैं अगर आप गरीब हैं तो जल तर्पण कर और दक्षिण में हाथ जोड़कर पित्रों के प्रति अपनी आस्था प्रकट कर सकते हैं। एक बाद याद रखने योग्य है जीते जी बुजुर्गों को कष्ट देने और उनकी मृत्यू के बाद श्राद्धकर उनको शांति देने का प्रयास करने वालों को उनकी कृपा प्राप्त नहीं होती। याद रखें अपने बुजुर्गों का सम्मान करें और उनके प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करें। उनका ध्यान रखें उन्हें प्रसन्न रखें। क्योंकि कर्म से बड़ी कोई पूजा नहीं होती है। शास्त्रों में कहा गया है कि वृद्धजनों की सेवा करने से आयु, विद्या, यश और बल में वृद्धि होती है।
आज के समय में श्राद्ध का क्या महत्व है? श्राद्ध एक ऐसा समय है जब आप अपने पूर्वजों के प्रति अपनी आस्था को प्रकट करते हैं। आप आज जो कुछ भी हैं आपमें जो संस्कार है, समाज आपको जिस नाम, कुल से जानता है उसमें आपके पूर्वजों द्वारा अर्जित की गई ख्याति का एक बड़ा योगदान होता है। कहा जाता है कि भगवान श्रीकृष्ण भी अपनी पिता की ख्याति के कारण ही वसुदेव के नाम से भी जाने जाते हैं। आप अपने पूर्वजों को धन्यवाद दें अगर उनसे कोई कुकर्म हो गया हो तो उससे शिक्षा लेकर दुष्कृत्यों से दूर रहे और जिस किसी को उनके द्वारा पीडि़त किया गया हो उनकी सहायता करें।
क्या पित्र भूत-प्रेत होते हैं? भूत अपने नाम के अनुरूप गत है गत जो जा चुका है पर किन्हीं बंधनों के कारण पुन: प्रकट हो गया है वो व्यथित है और व्याकुल है। उसे शांति की आवश्यकता है और उसे उसकी व्यथा से शांति दिलवाने के लिए उसके लिए उचित उत्तरकर्म अत्यावश्यक है।
अब यदि बात करें कि विज्ञान पित्रों और आत्माओं के बारे में क्या कहता है तो बात यह है कि विज्ञान ऐसी किसी ताकत को मानता तो नहीं है पर उनके द्वारा दी गई चुनौतियों का विज्ञान के पास कोई जवाब नहीं है। ये घटना जापान के ग्रामीण क्षेत्र की बताई जाती है जिस पर रिसर्च करने वाले वैज्ञानिक ने बताया कि ये घटना वहां आम सी बात है। बताया जाता है कि एक किसान अपने छोटे बेटे को लेकर खेत पर काम करने गया और दिन भर खेत में काम करता रहा जब शाम को घर लौटने का समय हुआ तो उसे याद आया कि उसका बेटा कहां गया? अंधेरा घिर रहा था और वो आशंकित और चिंतित था तभी एक रहस्यमय नीला गोला वहां प्रकट हुआ और किसान के चारों ओर घूमने लगा। इसके बाद वो पास के जंगल की ओर चला गया। किसान ने उस गोले को किसी निशान को इंगित करने वाला जाना और उसके पीछे चला गया। तकरीबन उसके साथ सौ से ज्यादा लोग थे जो उस नीले गोले को देखकर आगे बढ़ रहे थे। कुछ आगे जंगल में चलने के बाद वो गोला एक पेड़ के आसपास घूमने लगा। किसान ने देखा तो वहां उसका नन्हा बेटा वहां सो रहा था। उसने बेटे को उठाया और वो नीला गोला शून्य में विलीन हो गया। जापान के लोगों का मानना है कि ये पूर्वजों की आत्माएं होती हैं जो अपने वंशजों की विपत्ति से रक्षा करने के लिए प्रकट होती हैं। विश्व के अन्य कई देशों में भी पित्रों से संबंधित उत्सव मनाए जाते हैं कहीं चर्च में उनके नाम से प्रार्थना की जाती है तो कहीं उनके नाम से भोजना और अन्य सामग्री निकाली जाती है जैसे कोरिया में मृत व्यक्ति के नाम से उसकी मृत्यु के बाद भोजन, पानी, कभी मदिरा और अन्य सामग्री भी निकाली जाती है।
विज्ञान के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। सभी लोग श्राद्ध पक्ष को पंद्रह दिन का मानते हैं पर यह पंद्रह दिन का नहीं कुल मिलाकर सत्रह दिन का होता है जो पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन शुक्ल पक्ष की एकम को मातामहयानी नाना के श्राद्ध तक विस्तार पाता है। श्राद्ध का अर्थ परोपकार पर विस्तार पाता है और भले ही हम इसे एक धार्मिक कर्मकांड के रूप में मान्यता दे या न दें पर परोपकार, दया, करुणा और शुद्धमनस के रूप में इसका समर्थन करें।
इस समय वर्षाऋतु का अंत होकर शीत का आगमन होता रहता है। मौसम आगामी पर्व पर्व विजयादशमी के विजयोत्साह और दीपावली के प्रकाशमय आगमन को लेकर उत्सुक और उत्साहित होता रहता है। ऐसे समय पूर्वजों का स्मरण कर हम इस बात का संदेश देते हैं कि हम पादप यानी पेड़ की कितनी ही ऊंची टहनियां या पत्ते हो जाएं हमको हमारी जड़ों का कभी विस्मरण नहीं करना चाहिए और उनको आदर देना चाहिए जिस भूतकाल की थाती लेकर हमारा वर्तमान भविष्य की ओर अग्रसर हो रहा है।

बुधवार, 25 सितंबर 2019

पितृ रहस्यम्-भाग 1

भादव की पूर्णिमा के प्रकाश से अमावस्या की ओर बढ़ते पक्ष में एक पर्व मनाया जाता है जिसे श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। दिन प्रतिदिन घटते चंद्रमा और मंद होते प्रकाश के बीच भारतवर्ष में सभी लोग अपने-अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिये श्राद्धकर्म और अन्य धार्मिक आयोजन करते हैं जिसका एक ही प्रयोजन होता है उनके पूर्वजों की आत्मा की शांति।
कौन होते हैं पितृ? इनका इतिहास क्या है? क्यों इनकी शांति की जानी चाहिए? शास्त्र इनके बारे में क्या कहते हैं? क्या वास्तव में इनका शांंतिकर्म करवाने से इनको शांति मिलती है? अगर इनकी शांति न करवाई जाए तो क्या होगा? क्या पितृ भूत-प्रेत होते हैं? क्या ये अनिष्ट करते हैं या कृपा भी करते हैं? क्या श्राद्ध-तर्पणादि सबकुछ धनिक लोगों को ही करना चाहिए? वर्तमान में श्राद्ध पक्ष का क्या महत्व है? विज्ञान इनके बारे में क्या कहता है? क्या पित्रों ने विज्ञान को भी चमत्कृत किया है? ये सवाल सबके मन में आते हैं, तो आइये जानते हैं पितृदेव के बारे में-
पितृ मानव के पूर्वजों की आत्माएं होती हैं जो मृत्यु के पश्चात पृथ्वी और विभिन्न लोकों में अपने कृत कर्मों का उपभोग करती रहती हैं। पितृ अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों को धारणकर , स्वर्गदि श्रेष्ठ लोकों से लेकर नर्क जैसे नेष्ठ और पृथ्वी जैसे निम्र लोक में भ्रमण करते रहते हैं।
एक कथा के अनुसार एक बार जगतपिता ब्रम्हाजी श्रृष्टि निर्माण के कार्य से थककर विष्णु और महेश आदि के पास सहायता मांगने के लिए जा रहे थे तभी उनको पृथ्वी पर एक कुएं से विचित्र आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने अंदर झांककर देखा तो अंधकार में उनको आवाज आई कि हे पुत्र अगर तुम ही अपने कर्तव्य (सृष्टि रचना के कर्म) से विमुख हो जाओगे तो हमें शांति कैसे प्राप्त होगी? अब ब्रम्हदेव ने आश्चर्य से पूछा- आप कौन हैं? कुएं के अंदर से आवाज आई- हम तुम्हारे पितृ हैं। इस कथा से पता चलता है कि सृष्टि रचयिता ब्रम्हदेव के भी पितृ थे जो उनसे पूर्व सृष्टि निर्माण का कार्य कर रहे थे।
भगवान श्रीकृष्ण श्रीगीताजी में कहते हैं कि हे अर्जुन आत्मा अमर, अनाशवान है। इसे अग्रि जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता, मारुत यानी वायू इसे सुखा नहीं सकती कोई अस्त्र-शस्त्र इसे भेद नहीं सकता।
आत्मा क्या है? आत्मा ऊर्जा का एक रूप है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि ऊर्जा का अंत नहीं हो सकता वो केवल अपना रूप बलकर पुन: सक्रिय हो जाती है। यही ऊर्जा जब मानव शरीर धारण कर इस श्रृष्टि के कर्मबंधन में बंध जाती है तो ये मानव जीवन कहलाता है। इसी जीवन में मोह-ममता के बंधनों से बंधकर आत्मा जब कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो पाती तो वो मोक्ष को न पाकर अपने कर्मों के कारण विभिन्न लोकों की योनियों को भोगती रहती है। यही आत्मा पितृ कहलाती है।
लेख धारावाहिक के रूप में निरंतर जारी है। आगे पढ़ें दूसरा भाग।

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

सच्ची प्रशंसा

किसी नगर में ईसरदान नाम का एक महाकवि रहा करता था। वो एक आशु कवि भी था और अलंकारों से सुसंस्कृत ऐसी भाषा का प्रयोग करता था कि सुनने वाला मोहित हो जाता था।
एक बार उसने सोचा कि क्यों न विश्वभ्रमण किया जाए। ऐसा सोचकर वो अपने नगर से निकल पड़ा। नगर-नगर भ्रमण करते हुए वो एक नगर में पहुंचा। नगर का राजा कला का पुजारी था ये जानकर ईसरदान राजा के दरबार में जा पहुंचा और वहां पहुंचकर राजा को कविताएं सुनाई। उसने राज्य की कीर्ति और रानी की सुंदरता सहित राजा की महानता पर कविताएं सुनाईं। उसकी कविताएं सुनकर राजा प्रसन्न हो गया। उसने अपने मंत्री से कहा कि वो कवि ईसरदान को उचित इनाम दे, क्योंकि मंत्री भी कला का पारखी था। राजा के जाने के बाद ईसरदान प्रसन्न हुआ कि अब ईनाम मिलेगा। राजा के जाने के बाद मंत्री ने अपने लोगों को बुलाया और ईसरदान की पिटाई करने का आदेश दिया। ईसरदान अवाक् रह गया। मंत्री के लोगों ने उसे खूब पीटा और बहुत अपमानित किया।
राजदरबार से निकलकर ईसरदान को बहुत अपमान महसूस हुआ। उसने एक धारदार चाकू लिया और मंत्री के घर की दीवार फांदकर अंदर जा पहुंचा और कोने में छिप गया। वो वहां छुपकर मंत्री के आने की प्रतीक्षा करने लगा। उसका ध्येय था कि मंत्री की हत्याकर अपने अपमान का बदला लेगा।
कुछ समय बाद मंत्री घर पहुंचा और अपनी पत्नी को बुलाया। उसकी पत्नी ने उससे कहा- जानते हैं आप आपकी समूचे नगर में निंदा हो रही है। आपने एक अच्छे कवि ईसरदान का जो अपमान किया उससे लोगों में रोष है और सभी बातें कर रहे हैं कि आप कला के पारखी नहीं एक दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति हैं। मंत्री ने मंत्राणी से पूछा- प्रिय, तुम्हारी क्या राय है? मंत्राणी बोली- मुझे लज्जा आ रही है। अब मंत्री बोला- प्रिये तुम्हारी भी राय औरों सी ही है पर तुम क्या ये न जानना चाहोगी कि मैंने ऐसा क्यों किया? बताइये स्वामी, मंत्राणी बोली। अब मंत्री ने बताया, मेरी ईसरदान से कोई निजी शत्रुता नहीं है। वो एक महानकवि है पर उसने प्रारंभ से ही राजा-रानी की प्रशंसा में ही कविताएं सुनाईं। जिस महान ईश्वर ने उसे कवित्व का वरदान दिया उसने उनको तो बिसार ही दिया। प्रिये हमारा धर्म है कि सर्वप्रथम हम उस ईश्वर को धन्यवाद दें जिसने हमको उपहार स्वरूप कोई गुण दिया है न कि कुछ धन या अन्य प्रलोभन से किसी की प्रशंसा करें। इसलिये मैंने उसकी पिटाई करवाई।
अब वहां छिपे ईसरदान के ज्ञानचक्षु खुल गये और वो बाहर निकल आया। उसने चाकू मंत्री के चरणों में रखकर उससे क्षमा मांगी और पश्चाताप प्रकट किया। इसके बाद कवि ईसरदान ने एक दिव्य कवितागं्रथ की रचना की और उसे लेकर वो श्रीनाथ जी के धाम पहुंचा। कहते हैं भगवान श्रीनाथ जी ने स्वयं हाथ आगे कर ईसरदान से उस पुस्तक को लिया और स्वीकार किया। ईसरदान के नेत्रों से प्रसन्नता के आसूं बह निकले।
इस कथा से यह ज्ञान प्राप्त होता है कि हमें ईश्वर द्वारा प्राप्त हर गुण के लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए न कि उस गुण से किसी की व्यर्थ प्रशंसा कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करनी चाहिए।

शनिवार, 14 सितंबर 2019

धैर्य

एक बार गौतम बुद्ध ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और उन्हें कठौती देकर कहा- मुझे प्यास लगी है। जाओ पास नदी से पानी ले आओ। सभी शिष्य दौड़कर नदी पर पहुंचे। वो पानी निकालते उससे पहले ही गौपालक वहां से गौए ले जाने लगे। पशुओं के खुरों से नदी के पानी में मिट्टी फैल गई। सभी लौट वापस आए केवल आनंद को छोड़कर। बुद्ध आनंद की प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ समय बाद आनंद कठौती में शुद्ध जल लेकर आया। बुद्ध ने पूछा- आनंद, सभी खाली हाथ लौट आए तुम जल कैसे ले आए? आनंद बोला- भंते, मैंने पानी में मिट्टी के पुन: बैठने की प्रतीक्षा की और जब मिट्टी तल में बैठ गई तो मैं पानी ले आया।
अब बुद्ध अन्य शिष्यों से बोले- जीवन में धैर्य का बहुत महत्व है अगर तुम सभी धैर्य रखते तो आनंद के समान तुमको भी स्वच्छ पानी मिलता। आनंद ने धैर्य रखकर स्वच्छ पानी पाया और मेरी प्यास बुझाई। जीवन के किसी भी पथ पर धैर्य आपके लिए एक अत्यावश्यक मित्र की भांति है।
इस कथा से यह ज्ञान मिलता है कि किसी भी कार्य में धैर्य रखना आवश्यक है। कोई भी कर्म त्वरित रूप से फलदायक नहीं हो सकता। कार्य को करने के बाद उसके फल में परिणीत होने तक प्रतीक्षा करनी आवश्यक है। हबड़-दबड़ में किया गया काम कभी सफल नहीं होता।

बुधवार, 11 सितंबर 2019

अनंत भगवान श्रीगणेश

भगवान श्री गणेश, माता पार्वती के लाड़ले, शिव के पुत्र, गणों के नायक, देवताओं में प्रथम पूज्य, रिद्धि-सिद्ध के पति, शुभ-लाभ के पिता और दुष्ट असुरों में भय का पर्याय। भगवान श्री गणेश को कितनी ही दिव्य उपाधियां प्रदान की जाएं कम हैं वो अनआदि हैं तो अनंत भी हैं। जिसका न कोई आदि उसका न ही कोई अंत।
भगवान श्री गणेश की लीला मात्र से तीनों लोकों का कल्याण हो जाता है और स्मरण मात्र से भक्त के समस्त दु:ख दूर हो जाते हैं और वो दिव्य आनंद को पाता है। भगवान श्री गणेश के विविध रूपों की विविध लीलाएं हैं। उनका बाल रूप भी दिव्य लीलाओं से भरा हुआ है। आइये जानते हैं उनके बाल्यकाल की एक दिव्य लीला की आनंदमय कथा।
एक बार कैलाश पर भगवान शिव बैठे थे और पास में ही बाल गणेश अपने भाई कार्तिकेय के साथ खेल रहे थे। माता पार्वती किसी कार्यवश बाहर गई हुई थीं। तभी वहां देवराज इंद्र आए। वो भगवान शिव के पास बैठे और स्तुति करके वापस जाने लगे जाते-जाते उन्होंने एक बहुत ही सुंदर और अलौकिक फल भगवान शिवशंकर को समर्पित किया और जाने को प्रशस्त हुए। इतने में वहां सृष्टि रचयिता ब्रम्हदेव आए देवराज उनको प्रणाम करके वहां से चले गए। भगवान शिव तो ठहरे भोले भाले उन्होंने ब्रम्हदेव को वो फल दिखाया और पूछने लगे, ब्रम्हाजी इस फल को किसे दे दूं। उन्होंने सामने खेल रहे गणेश और कार्तिकेय की ओर ब्रम्हाजी का ध्यान आकृष्ट किया। ब्रम्हाजी बोले- ये फल तो कार्तिकेय को ही दो। ये बात पास खेल रहे गणेश ने सुन ली और ब्रम्हाजी के इस पक्षपात पर उनको गुस्सा आ गया पर वो कुछ नहीं बोले।
समय का चक्र गतिशील है। कुछ दिनों बाद भगवान शंकर बाल गणेश को लेकर ब्रम्हलोक पहुंचे। वहां शिवजी से आंखें बचाकर भगवान श्रीगणेश भयंकर और विचित्र मुंह बनाकर ब्रम्हदेव को भयभीत करने लगे। श्रीगणेश का विकट स्वरूप देखकर ब्रम्हदेव भयभीत हो गए। तभी ये सब देखकर भगवान शंकर के सिर पर विराजमान चंद्रमा हंसने लगा उसकी आवाज सुनकर श्रीगणेश ने उसे देखा उसे श्रीगणेश पर हंसता देखकर बालगणेश को क्रोध आ गया उन्होंने चंद्रमा को शाप देते हुए कहा, अकारण मेरा उपहास कर रहा है हे चंद्रमा तुझे अपनी काया का इतना अभिमान है जा ये काया धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगी। उसी क्षण से चंद्रमा निस्तेज होने लगा। अब चंद्रमा घबरा गया और श्रीगणेश से विनय करने लगा- प्रभु मुझे क्षमा कर दो। उसका विलाप सुनकर श्री गणेश को दया आ गई और उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा- चंद्रमा मेरा शाप अटल है पर जिस तरह से तू कृष्ण प्रतिपदा से क्षीण होकर अमावस्या को लुप्त हो जाएगा उसी प्रकार पुन: शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से बढ़कर पूर्णिमा को अपना पुराना रूप पुन: प्राप्त कर लेगा। चंद्रमा प्रसन्न होकर बोला- श्रीगणेश की जय हो श्री गणेश की जय हो।
श्री गणेश की इस लीला से शिक्षा मिलती है कि कभी भी किसी भी चीज का अभिमान नहीं करना चाहिए। जैसे फल आने पर वृक्ष झुक जाते हैं और जल से भरने पर बादल नीचे हो जाते हैं वैसे ही मानव को सदैव विनम्र और सदाचारी बनना चाहिए।

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...