google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: धैर्य

शनिवार, 14 सितंबर 2019

धैर्य

एक बार गौतम बुद्ध ने अपने सभी शिष्यों को बुलाया और उन्हें कठौती देकर कहा- मुझे प्यास लगी है। जाओ पास नदी से पानी ले आओ। सभी शिष्य दौड़कर नदी पर पहुंचे। वो पानी निकालते उससे पहले ही गौपालक वहां से गौए ले जाने लगे। पशुओं के खुरों से नदी के पानी में मिट्टी फैल गई। सभी लौट वापस आए केवल आनंद को छोड़कर। बुद्ध आनंद की प्रतीक्षा करने लगे।
कुछ समय बाद आनंद कठौती में शुद्ध जल लेकर आया। बुद्ध ने पूछा- आनंद, सभी खाली हाथ लौट आए तुम जल कैसे ले आए? आनंद बोला- भंते, मैंने पानी में मिट्टी के पुन: बैठने की प्रतीक्षा की और जब मिट्टी तल में बैठ गई तो मैं पानी ले आया।
अब बुद्ध अन्य शिष्यों से बोले- जीवन में धैर्य का बहुत महत्व है अगर तुम सभी धैर्य रखते तो आनंद के समान तुमको भी स्वच्छ पानी मिलता। आनंद ने धैर्य रखकर स्वच्छ पानी पाया और मेरी प्यास बुझाई। जीवन के किसी भी पथ पर धैर्य आपके लिए एक अत्यावश्यक मित्र की भांति है।
इस कथा से यह ज्ञान मिलता है कि किसी भी कार्य में धैर्य रखना आवश्यक है। कोई भी कर्म त्वरित रूप से फलदायक नहीं हो सकता। कार्य को करने के बाद उसके फल में परिणीत होने तक प्रतीक्षा करनी आवश्यक है। हबड़-दबड़ में किया गया काम कभी सफल नहीं होता।

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