google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: अक्टूबर 2017

गुरुवार, 5 अक्टूबर 2017

मैं कहाँ हूँ..... मैं कहाँ हूँ.......?

इस रोज की भागदौड़ से रुककर कभी सोचा है मैं कहाँ हूँ? मैं कहाँ होना चाहता हूँ, क्या करना चाहता हूँ, क्या होना चाहता हूँ और इसके विपरीत मैं यहाँ क्यों हूँ, मैं कहाँ नहीं होना चाहता हूँ, मैं क्या नहीं करना चाहता हूँ, ....... मैं घर में हूँ....ऑफिस में हूँ.....मंदिर में हूँ, गिरजा में या मस्जिद में हूँ, जहाँ सुख है मैं वहाँ होना चाहता हूँ.....जहाँ मेरा प्रिय है वहाँ मैं होना चाहता हूँ.....मैं आनंद मनाना चाहता हूँ, मैं घर में या ऑफिस में क्यों हूँ, क्या यहाँ आनंदित हूँ, मैं क्या हो गया हूँ और क्या यहाँ संतुष्ट हूँ.... अरे तुम सोचोगे क्या बेवकूफी है ये अरे मैं हूँ तो हूँ..धारा में बह रहा हूँ, बहता जा रहा हूँ, आसमान में रोज तारे चमकते हैं, बादल आते हैं सुंदर आकृतियाँ बनाते हैं, बरस जाते हैं, मेरे प्रिय ने आज क्या कहा? उसकी प्रार्थना क्या थी? मैं जहाँ हूँ वहाँ क्या और कैसा हूँ? नहीं सोचा, मैं तो बस बहा जा रहा हूँ समय की धारा में, जैसे ढोर को हकाल दिया वो चारा खाने चला गया, गोधुलि में वापस आ गया। तुम अपने आपको धारा में बहता पाकर उसकी रूप हो गए। भूल गए कि तुम तुम नहीं एक वृहद विश्व हो, तुम मानव हो। तुम पाषाण नहीं तुम पशु नहीं। तुम तो मानव हो पक्षी की तरह आकाश में उडऩा है तुम्हें, आकाश की अतल गहराई नापना है तुम्हे, अब तुम सोचोगे इस सब का क्या मतलब? बात को समझने के लिए तुम्हें अपने आप को टटोलना पड़ेगा, जो तुम में होकर भी तुम से विलग हो गया है उसे ढूंढना होगा, उससे पूछना होगा क्यों भाई प्रसन्न तो हो न! लुटेरा गजनवी जब मृत्युशैया पर पड़ा था तब पछता रहा था, मिन्नतें कर रहा था, रहम की दुआएं मांग रहा था...हाय, पूरी जिंदगी लूट-पाट में लगा दी। आज देखता हूँ, कितना कुछ था मेरे पास, यही रहता राज करता और जीवन के सुख का भोग करता। मेरी हूर सी पत्नियाँ, ऐशोआराम, कितना कुछ था पर मैं वहाँ लूटपाट में लगा रहा। आज मौत आ रही है। ये सब यहाँ छूट रहा है। मेरी शैयासुख देने वाली स्वर्गीय सुंदरी पत्नियाँ बूढ़ी होकर पहचान में नहीं आतीं। आँखे दुर्बल, देह दुर्बल न खा पाता हूँ न पी पाता हूँ, बस मौत को आते देख रहा हूँ। हाय कोई मेरी जवानी लौटा दो, मौत को हटा दो। मैं अब लड़ूँगा नहीं लूटूँगा नहीं। बस राज करूँगा और सुख भोगूँगा। लुटेरा गजनवी तड़प-तड़प कर मर गया। अब क्या सोच होनी चाहिए? जीवन में जितना काम आवश्यक है उतना ही सुखभोग भी वर्ना कल पछताना न हो.......

बुधवार, 4 अक्टूबर 2017

संस्कार


संस्कार क्या होते हैं? संस्कार का अर्थ क्या है और इनका हमारे जीवन में महत्व क्या है? संस्कार दो तरह के होते हैं पहला बाह्य जैसे गर्भाधान, पुंसावन, अन्नप्राश्चन आदि और दूसरा आंतरिक। हम जो अपने आसपास के माहौल से ग्रहण करते हंै वो सूक्ष्म रूप से हमारे अंतर्मन में संग्रह हो जाता है और बाद में ये हमारे द्वारा किए जाने वाले हर कार्य को प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है। ये इस जन्म से ही नहीं जन्म-जन्मातरों का संग्रहण होता है अथवा माता-पिता या अन्य से ही या पारिवारिक माहौल में ये पनपते और विकसित होते हैं। संस्कार एक ऐसी संपत्ति होते हैं जो अमूल्य होते हैं और सदैव वंदनीय होते हैं इनको त्यागना अपना आदर्शों की हत्या के समान है। हमारे पूर्वजों बड़ी श्रद्धा से इनका पालन किया और इनको विकसित कर पनपने का मौका दिया। संस्कार जो अंतस्थ होकर बाह्य जगत को प्रभावित करते हैं और सद्स्वरूप होकर सदैव मानव को उच्चता के शिखरों को प्राप्त करने हेतु प्रवृत्त करने वाले संस्कारों को ये ब्लॉग समर्पित है।
।। संसार को प्रकाशित करने वाले और जीवन को उच्चता प्रदान कर मानव जीवन को श्रेष्ठता देकर विश्व कल्याण करने वाले ईश्वर को समर्पित।।

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...