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गुरुवार, 19 सितंबर 2019
सच्ची प्रशंसा
किसी नगर में ईसरदान नाम का एक महाकवि रहा करता था। वो एक आशु कवि भी था और अलंकारों से सुसंस्कृत ऐसी भाषा का प्रयोग करता था कि सुनने वाला मोहित हो जाता था।
एक बार उसने सोचा कि क्यों न विश्वभ्रमण किया जाए। ऐसा सोचकर वो अपने नगर से निकल पड़ा। नगर-नगर भ्रमण करते हुए वो एक नगर में पहुंचा। नगर का राजा कला का पुजारी था ये जानकर ईसरदान राजा के दरबार में जा पहुंचा और वहां पहुंचकर राजा को कविताएं सुनाई। उसने राज्य की कीर्ति और रानी की सुंदरता सहित राजा की महानता पर कविताएं सुनाईं। उसकी कविताएं सुनकर राजा प्रसन्न हो गया। उसने अपने मंत्री से कहा कि वो कवि ईसरदान को उचित इनाम दे, क्योंकि मंत्री भी कला का पारखी था। राजा के जाने के बाद ईसरदान प्रसन्न हुआ कि अब ईनाम मिलेगा। राजा के जाने के बाद मंत्री ने अपने लोगों को बुलाया और ईसरदान की पिटाई करने का आदेश दिया। ईसरदान अवाक् रह गया। मंत्री के लोगों ने उसे खूब पीटा और बहुत अपमानित किया।
राजदरबार से निकलकर ईसरदान को बहुत अपमान महसूस हुआ। उसने एक धारदार चाकू लिया और मंत्री के घर की दीवार फांदकर अंदर जा पहुंचा और कोने में छिप गया। वो वहां छुपकर मंत्री के आने की प्रतीक्षा करने लगा। उसका ध्येय था कि मंत्री की हत्याकर अपने अपमान का बदला लेगा।
कुछ समय बाद मंत्री घर पहुंचा और अपनी पत्नी को बुलाया। उसकी पत्नी ने उससे कहा- जानते हैं आप आपकी समूचे नगर में निंदा हो रही है। आपने एक अच्छे कवि ईसरदान का जो अपमान किया उससे लोगों में रोष है और सभी बातें कर रहे हैं कि आप कला के पारखी नहीं एक दुष्ट स्वभाव के व्यक्ति हैं। मंत्री ने मंत्राणी से पूछा- प्रिय, तुम्हारी क्या राय है? मंत्राणी बोली- मुझे लज्जा आ रही है। अब मंत्री बोला- प्रिये तुम्हारी भी राय औरों सी ही है पर तुम क्या ये न जानना चाहोगी कि मैंने ऐसा क्यों किया? बताइये स्वामी, मंत्राणी बोली। अब मंत्री ने बताया, मेरी ईसरदान से कोई निजी शत्रुता नहीं है। वो एक महानकवि है पर उसने प्रारंभ से ही राजा-रानी की प्रशंसा में ही कविताएं सुनाईं। जिस महान ईश्वर ने उसे कवित्व का वरदान दिया उसने उनको तो बिसार ही दिया। प्रिये हमारा धर्म है कि सर्वप्रथम हम उस ईश्वर को धन्यवाद दें जिसने हमको उपहार स्वरूप कोई गुण दिया है न कि कुछ धन या अन्य प्रलोभन से किसी की प्रशंसा करें। इसलिये मैंने उसकी पिटाई करवाई।
अब वहां छिपे ईसरदान के ज्ञानचक्षु खुल गये और वो बाहर निकल आया। उसने चाकू मंत्री के चरणों में रखकर उससे क्षमा मांगी और पश्चाताप प्रकट किया। इसके बाद कवि ईसरदान ने एक दिव्य कवितागं्रथ की रचना की और उसे लेकर वो श्रीनाथ जी के धाम पहुंचा। कहते हैं भगवान श्रीनाथ जी ने स्वयं हाथ आगे कर ईसरदान से उस पुस्तक को लिया और स्वीकार किया। ईसरदान के नेत्रों से प्रसन्नता के आसूं बह निकले।
इस कथा से यह ज्ञान प्राप्त होता है कि हमें ईश्वर द्वारा प्राप्त हर गुण के लिए उन्हें धन्यवाद देना चाहिए न कि उस गुण से किसी की व्यर्थ प्रशंसा कर अपने स्वार्थों की पूर्ति करनी चाहिए।
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