google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: फ़रवरी 2020

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

पार्वती के नटेश्वर

हिमालय पर तपस्या कर रही पर्वतराज हिमालय नंदिनी पार्वती का देह कृशकाय हो चुका था। फिर भी उनकी तपस्या लगातार चल रही थी निश्चित समय पर ब्रम्हदेव प्रकट हुए और पार्वती के ऊपर अमृत की धार डाली जिसके कारण उनका देह पुष्ट हुआ और उसमें से अलौकिक प्रकाश निकलने लगा। शिवविवाह का वरदान पाकर देवी पार्वती वापस लौट आईं। अब उन्हें प्रतीक्षा थी कि कब शिवशंकर की ओर से विवाह का प्रस्ताव आता है। एक दिन पर्वतराज हिमालय के दरबार में बड़ा आनंद हो रहा था। पर्वतराज हिमालय जहां सिंहासन पर विराजमान थे वहीं मैनाक उनके पास सिंहासन पर आरूढ़ था और पास ही में ऊपर की ओर रानी मैना और पार्वती अन्य महिलाओं और दासियों के साथ बैठी थीं तभी द्वारपाल आया।
वो बोला- महाराज एक नट आया है और आपको अपनी कला दिखाना चाहता है।
दरबार में यह समय मनोरंजन का था सो हिमालय बोले- उस नट को ससम्मान ले आओ।
कुछ ही क्षणों में दरबार के मध्य में एक नट खड़ा था। बड़ा ही विचित्र वेश था उसका। एक हाथ में त्रिशूल-दूसरे में कमंडल, बड़ी-बड़ी जटाएं, गले में भयंकर नाग को लपेटे उसके देह पर मात्र सिंह का चर्म वस्त्र के रूप में था। उसकी आंखें रहस्यमयी थीं और वो उतने ही रहस्यमय रूप से मुस्कुरा रहा था। उसने आते ही पट के पीछे बैठीं पार्वती को निहारना शुरू कर दिया। पार्वती भी यह बात भलीभांति समझ गईं। हिमालय बोले- कौन हो तुम? और क्या कला दिखाने आये हो।
नट बोला- मेरा नाम शंकर है। आपको अपनी कला दिखाने आया हूं।
तो दिखाओ कला, हिमालय बोले।
नट ने दरबार में कई जादू के खेल दिखाए। सब बोले वाह-वाह यह तो महान नट है। इसके बाद उसने हाथ ऊपर किया तो सब लोगों पर पुष्पों बरसने लगे और पार्वती पर तो अलौकिक पुष्पों की दिव्य वर्षा होने लगी। वो पुष्पों से नववधु की भांति सज गईं।
अब हिमालय ने कहा- हम बहुत प्रसन्न हैं मांगों क्या मांगना है?
नट बोला- दे सकेंगे?
हिमालय बोले- नटेश्वर, मांग कर तो देखो।
अब नटेश्वर पार्वती की ओर देखकर बोला, जो पहले ही स्वर्ण और रजत के पट के पीछे से नट को देखकर तब से ही मुस्कुरा रही थीं जब से आया था- पर्वतराज समस्त संसार की सभी मूल्यवान वस्तुओं, जीवों, मानवों-मानवियों और समस्त दैवीय तथा अदैवीय शक्तियोंं से भी श्रेष्ठ। ब्रम्हा की रचना, विष्णु की पालन और शिव संहार शक्ति का मूल। शक्तियों में चरम-परम। सृष्टि और असृष्टियों, चेतन-जड़ और ब्रम्हांडों पर राज करने वाली शक्ति। अद्वितीया तेरी पुत्री पार्वती मुझे दे दे।
दरबार में सन्नाट छा गया। मैनाक ने अस्त्र उठा लिया और लल्कारा (चुनौती दी)- तेरी मृत्यु आ गई है नट। नट ने अट्टहास किया और हाथ ऊपर उठाया तो केवल देवी पार्वती को छोड़कर सभी किंकर्ताविमूढ़ होकर जहां के तहां ठहर गए। नट पार्वती को देखकर मुस्कुराया। ये नट कोई और नहीं बल्कि स्वयं नटराज शिवशंकर थे, जो अपनी होने वाली वधु की मुंहदिखाई करने और आश्वस्त करने कि मैं आ गया हूं चिंता न करना। साथ ही यह बताने आये थे कि शीघ्र ही विवाह का प्रस्ताव भेजूंगा।
शिवशंकर के जाते ही सभी को चेतना आई। तब पार्वती ने सभी को बताया कि वो कोई और नहीं स्वयं शिवशंकर थे। सभी आश्चर्य और आनंद से सराबोर हो गये।

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...