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गुरुवार, 23 अप्रैल 2020
कहानी कावेरी की
बहुत समय पहले दक्षिण भारत में भयंकर आकाल पड़ा। नदियां सूख गईं। जीवन मरण हो गया और चारों ओर हाहाकार होने लगा।
गौ, ब्राम्हण सहित पूरी सृष्टि मंद होने लगी। देवताओं को मनाने के सारे जतन विफल हो गये। यही नहीं देवलोक से देवता भी मानवजाति के इस विनाश को देखकर आहत होने लगे। भूमिमंडल पर जहां तक देखो अस्थि-पंजरों का समुद्र नजर आने लगा।
मानवता की इस त्राहिमाम का किसी के पास कोई हल नहीं था। ऐसे समय अगस्थ्य मुनि वहां पहुंचे। लोगों की मरणासन्न दशा देखकर वो बहुत दुखित हो गये।
उन्होंने मन में विचार किया और भीषण नाद किया- बस अब और नहीं। वो इस करुणकथा को लेकर कैलाशा पहुंचे। उन्होंने भगवान शिव और पार्वती सहित बालगणेश के दर्शन कर पूरा वृतांत सुनाया।
भगवान शिव ने उन्हें कमंडल में दिव्य जल दिया और कहा कि हे ऋषिश्रेष्ठ यह जल वास्तव में एक विशाल नदी है जिसे आप उचित स्थान पर गिरा दीजियेगा। इसके बाद इसके जल से निकलने वाली नदी समूचे क्षेत्र को पुन जीवन से पूर्ण कर देगी।
अब अगस्थ्य पृथ्वी की ओर चले। भगवान बालगणेश भी चुपचाप उनके पीछे चल दिये। पृथ्वी पर आकर अगस्थ्य ऋषि ने एक पर्वत पर आसन जमाया और अपने नित्यकर्म में लग गये। भगवान बालगणेश ने ये देखा तो विचलित हो गये।
एक ओर तो मानव जीवन समाप्त हो रहा है और ऋषिवर जीवनदायिनी नदी को मुक्त करने के स्थान पर अपने नित्यकर्म में लगे हैं। अब बालगणेश का धैर्य टूट गया। उन्होंने एक कौवे का रूप लिया और कमंडल को वहां जाकर गिरा दिया।
कमंडल से निकलते ही जल ने विशाल नदी का रूप ले लिया और मरणासन्न जीवों को जीवनदान दिया। कमंडल से निकली इस नदी ने भगवान श्रीगणेश को प्रणाम किया जो उस समय कौवे के रूप में थे।
अगस्थ्य मुनि ने जब यह देखा तो वो क्रोधित हो गये और कौवे रूपी भगवान श्रीगणेश को शाप देने के लिये प्रवृत्त हुए। यह देखकर भगवान श्रीगणेश अपने असली रूप में आ गये।
अगस्थ्य आश्चर्य में पड़ गये- हे देव गणेश आपने ऐसा क्यों किया जबकि मैं तो स्वयं ही नदी को मुक्त करने वाला था। भगवान श्रीगणेश बोले- हे महर्षि, आप नदी को मुक्त करने से पहले अपने नित्यकर्म पूर्ण करना चाहते थे जिससे होने वाले विलंब के परिणामस्वरूप और अधिक हानि होने की संभावना थी।
श्रीगणेश ने आगे कहा- ऋषिवर, शुभस्य शीघ्रम् अर्थात जो शुभकार्य हो उसे पहले पूर्ण करना चाहिये। जब मुझे आभास हुआ कि शुभकार्य में विलंब हो रहा है तो मैने स्वयं ये कार्य कर दिया।
अब अगस्थ्य को अपनी गलती की प्रतीती हुई। वह बोले- हे विघ्रहर्ता आपने मेरे नेत्र खोल दिये। आपने शुभ हाथों से ये कार्य पूर्ण हुआ है। इस लिये ये सर्वदा कल्याणकारी होगा परंतु प्रभु इस नदी का नाम क्या होगा?
इस पर भगवान श्रीगणेश बोले- मैंने कौवे के रूप में इस नदी का कमंडल से मुक्त कर जन्म दिया है इसलिये यह कावेरी के नाम से प्रसिद्ध होगी और जब तक यह सृष्टि है ये समूचे भूमंडल का कल्याण करती रहेगी।
इस कथा में भगवान श्रीगणेश शिक्षा देते हैं कि लोकल्याणकारी कार्य बिना विलंब के पूर्ण किये जाने चाहिये। अपने किसी अन्य कार्य को प्राथमिकता न देकर सबसे पहले वह कार्य करना चाहिये जिसे आपने लक्ष्य किया हो।
सोमवार, 6 अप्रैल 2020
कहानी बाली और सुग्रीव की
(यह कहानी विभिन्न स्रोतों को आधार बनाकर लिखी गई है।)
एक समय की बात है। भगवान शिवशंकर सृष्टि रचियता ब्रम्हा जी के पास पहुंचे और उनसे कहा कि कलिकाल में उनके पुत्र वेदों का महात्म्य क्षीण हो जाएगा। पाप पुण्य हो जायेगा। पुराण, उपनिषद और शास्त्रों को कोई नहीं मानेगा। वेदों को मानने वाले नपुंसकों की भांति होकर विधर्मियों के धर्मों के अनुयायी हो जायेंगे। मानव मानव का शत्रु हो जायेगा। विधर्म धर्म का स्थान ले लेगा और महाविनाश होगा। ब्रम्हदेव यह सब देखेंगे पर कुछ कर नहीं सकेंगे।
यह सुनकर ब्रम्हाजी की आंखों से आंसू निकला। यह आंसू समुद्र में गिरा और इससे एक वानरमुखी मानव को जन्म हुआ। इस पुरुष का नाम था रिक्षराज। रिक्षराज ने जन्म के पश्चात जल में अपना मुख देखा और अपना कुरुप चेहरा देखकर पुन: समुद्र में कूद गये। अब समुद्र में उनके स्थान पर एक अतीव सुंदर स्त्री प्रकट हुई। इसका नाम रिक्षिका था।
रिक्षिका ने ब्रम्हाजी की तपस्या की और उनके निर्देशानुसार देवराज इंद्र को तपस्या द्वारा प्रसन्न किया। इंद्र ने रिक्षिका को एक महाबली पुत्र की माता बनने का वरदान दिया और अंतर्धान हो गये। इसके पश्चात रिक्षिका ने सूर्यदेव की आराधना की और उन्होंने भी रिक्षिका को एक शक्तिशाली पुत्र होने का वरदान दिया।
कालांतर में रिक्षिका ने इंद्र के वरदान से बाली और सूर्य के वरदान से सुग्रीव नामक वानर बालकों को जन्म दिया।
बाली और सुग्रीव ने दक्षिण भारत में पम्पापुर सरोवर के पास एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की।
बाली इंद्र का पुत्र होने पर विशाल देह का स्वामी था। वह सूर्योदय के समय पवन मार्ग से होकर सप्तमहासागरों पर जाकर सूर्य को अघ्र्य देता और फिर वापस लौटकर राजकाज में लग जाता। बाली ने समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत तक को उसके स्थान से हिला दिया था। समुद्र मंथन से प्रकट दिव्य सुंदरी तारा से उसका विवाह हुआ था। बाली को वरदान था कि उसके शत्रु की आधी शक्ति उसमें आ जायेगी।
एक भी कहा जाता है कि बाली ने रावण को पूंछ में लपेट लिया था। जिसका उसको भास भी नहीं था। वह रावण को लेकर यहां-वहां घूमता रहा और बाद में मित्रों द्वारा बताये जाने पर उसने रावण को छोड़ दिया। ऐसा भी कहा जाता है कि वह रावण को कांख में दबाकर ले गया था।
सुग्रीव सूर्य का पुत्र था और बल में बाली से बहुत कमतर था पर वह स्वभाव से शांतिप्रिय था। वहीं बाली क्रोधी और अधीर स्वभाव का था। बाली की बढ़ती शक्ति के कारण लोग उसकी वीरता की मिसाल दिया करते थे।
एक बार मयदानव का ज्येष्ठ पुत्र दुंदुभी, जो एक विशाल महिष यानी भैंसे के रूप में रहा करता था, अपने बल का प्रयोग करने के लिये समुद्र के पास गया और उसे ललकारने लगा। समुद्र ने उससे कहा कि वह उसके बराबर शक्तिशाली नहीं है। उसे कदाचित हिमवान कैलाश से जाकर बलाबल का परीक्षण करना चाहिये। वह उसके बराबर शक्तिशाली हैं।
इसके बाद दुंदुभी कैलाश पर्वत के पास पहुंचा और महानाद करके उसे युद्ध की चुनौती देने लगा। अब कैलाश दुंदुभी के सम्मुख प्रकट हुए और उसको समझाया कि वह उसके बराबर के शक्तिशाली नहीं हैं। उसको यदि बलाबल का परीक्षण करना ही है तो वह पम्पापुर जाकर वानरराज बाली से युद्ध करे वह ही उसके बराबर के शक्तिशाली हैं।
अब दुंदुभी बकारता हुआ पम्पापुर जा पहुंचा और बाली को चुनौती दी। बाली दुंदुभी के सामने जा पहुंचा और उसे मार डाला। वह इतने क्र्रोध में था कि दुंदुभी के शव को उठाकर चार योजन दूर फेंक दिया। दुंदुभी के शव के गिरते ही उससे रक्त की बूंदें उछली और मतंग ऋषि केे आश्रम पर जा गिरी। यह देखकर मतंग क्रोध में आ गये और शाप दिया कि यदि बाली इस क्षेत्र से एक योजन के क्षेत्र में आया तो तुरंत ही मर जाएगा। बाली से बहुत क्षमा मांगी पर मतंग ने उसे क्षमा नहीं किया। इसी एक योजन क्षेत्र में दो पर्वत आते थे-रिष्यमूक और मलयाद्री।
दुंदुभी के मरने के बाद उसका छोटा भाई मयपुत्र मायावी दुखित हो गया और मदिरा का सेवन कर यदाकदा पम्पापुर पहुंचकर बाली को दुर्वचन कहने और चुनौती देने लगा।
एक दिन मायावी फिर बाली को चुनौती देने पहुंचा। आज बाली के धैर्य ने उत्तर दे दिया और वह मायावी को मारने के लिये निकल पड़ा। सुग्रीव भी उसके साथ चला गया। मायावी डर के मारे एक गुफा में जा घुसा। बाली भी यहां जा पहुंचा और सुग्रीव को द्वार पर तैनात कर वह गुफा के अंदर चला गया। एक वर्ष बाद गुफा से खून की धारा बहती हुई बाहर निकलने लगी। यह देख सुग्रीव भयभीत हो गया। वह यह सोचकर कि मायावी ने बाली को मार डाला है अब वह बाहर आकर उसे मार डालेेगा, गुफा के द्वार को एक बड़ी शिला से बंदकर भागकर वापस आ गया। यहां सभी ने उसका राजतिलक कर उसे राजा बना दिया पर बाली मायावी को मारकर शिला हटाकर बाहर आ गया।
उसने वापस आकर सुग्रीव को बुरी तरह मारा। सुग्रीव प्राण बचाकर रिष्यमूक पर्वत पर पहुंच गया। बाली यहीं नहीं रुका और अपनी ही भ्रातृवधु रूमा को बलात अपनी पत्नी बना लिया।
इसके बाद लंकापति रावण भगवती सीता का अपहरण कर ले गया और भगवान श्रीराम लक्ष्मण सहित उनको ढूंढते हुए रिष्यमूक पर्वत पर पहुंचे और महावीर हनुमान के सुझाव पर सुग्रीव से मित्रता कर बाली का वध कर सुग्रीव को पम्पापुरी का राजा बना दिया।
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