google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: जून 2018

बुधवार, 27 जून 2018

Death

Once Garuda was flying in the heights of great blue sky. Meanwhile he was crossing Kailaasha mountain. He planed to meet to God Shiva and God mother Parvati. He arrived on Kailaasha. On Kailaasha he saw a little beautiful bird. Meanwhile God Yama also arrived there. He stared that little bird. Garuda thought the death of this little bird is sure. In order to save the life bird Gauda took her and flew to some other place. In a few seconds he came thousand miles far from Kailaasha. In a beautiful forest Garuda left the bird a he returned to Kailaash. When he arrived there he saw Yama raj was standing there and was surprised. Pranama (greeting) Yama dev- Garuda said. Welcome Garuda dev... What happened Yamaraj....Garuda dev when I was arrived here I saw a little bird here. when I saw it, it came to know to me that after some while it was feed up by a snake thousand miles far from this place. On that time I was thinking how this little bird could fly so far and long but now I’m sure it has been happened. The Garuda wondered and thought....Death is the final truth of the World. What ever we are doing is the will of God Chitragupata. The God made him as a medium of his work. He was thinking to save the little bird but in ignorance he give bird into the mouth of death.

शुक्रवार, 22 जून 2018

हनुमान का वाटिका विध्वंस

देवी सीता ने हनुमान को बहुत आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद पाकर हनुमान आनंदित हो गए। अब हनुमान की अभिलाषा रावण को अच्छा सबक सिखाने की थी। वो सीता से बोले- मां मैं बहुत भूखा हूं। वाटिका में लगे सुंदर फलों को देखकर मन चंचल हो रहा है। आप आज्ञा दें तो अपनी क्षुधा शांत कर लूं। सीता को हनुमान के बल और श्रीराम की कृपा पर शंका तो नहीं थी पर अकेले हनुमान और असंख्य निशाचरों के बारे में सोचकर वो चिंतित हो गईं- वत्स, हनुमान इस उपवन की रखवाली असंख्य बलशाली निशाचर यानी राक्षस करते हैं। हनुमान बोले- मां उनका मुझे कोई भय नहीं है, अगर आप प्रसन्न मनस से आज्ञा दें तो मैं फल खा लूं। सीता का मन तो नहीं था पर क्षुधातुर हनुमान को देखकर उन्होंने जाने की आज्ञा दे दी।
हनुमान वहां गए। उन्होंने देखा वाटिका बहुत ही व्यवस्थित थी। विभिन्न प्रकार के फल और सुगंधित पुष्प वहां लगे थे। छाया सुखदायक और भूमि पर कोमल घास थी। पेड़ों-पौधे क्यारियों में लगे थे जिनमें व्यवस्थित रूप से स्वत: पानी की आपूर्ति होती थी। पेड़ों की हरितिमा देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों वो वैकुंठवन में आ गए हों। यही नहीं इतने सुखदायक वातावरण को देखकर यहां विभिन्न भांति के पक्षी भी निवासरत थे। इनकी मधुर कूज्य ध्वनि सुनकर मन उल्लासित हो जाता था। हनुमान ने यहां-वहां देखा भांति-भांति के रंगीन फल देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया। वो एक पेड़ के पास गए और फल खाए। फल खाया, स्वादिष्ट लगा तो ठीक अन्यथा उस और अन्य पेड़ों को उखाडऩा शुरू कर दिया। उपवन में शोर सुनकर रक्षकों ने देखा। वो हैरान रह गए। एक विशालकाय वानर पेड़ उखाड़ रहा है। पहले तो उन रक्षकों ने ही हनुमान को भगाने की कोशिश की पर हनुमान ने उनपर वृक्ष और फल फेंकने शुरू कर दिये। इस पर लंका नगर के सुरक्षा प्रमुख वहां आए पर वो भी हनुमान के सम्मुख टिक न पाए। जब सब हार गए तो लंका नगर प्रमुखसेनापति जाम्बुवली को बुलावा भेजा गया। इस समय लंका की राजसभा में लंकापति रावण सभी सभासदों के साथ उपस्थित था। सभा में जाम्बूवली का पिता और लंका का मुख्य सेनापति प्रहस्त भी उपस्थित था। जाम्बूवली हनुमान से लडऩे पहुंचा और उन पर भांति-भांति से प्रहार करने लगा। हनुमान के एक ही प्रहार में जाम्बूवली के प्राण पखेरू उड़ गए।
अब रावण और मंदोदरी के छोटे पुत्र अक्षय कुमार को समस्या बताई गई। अक्षय कुमार वहां पहुंचा पर वो भी हनुमान के आगे टिक न सका और मृत्यु को प्राप्त हो गया। महाबली हनुमान लंकापति को श्रीराम का प्रताप दिखाना चाहते थे। अक्षय कुमार की मृत्यु होते ही सभी समझ गए कि ये महाकपि को सामान्य वानर नहीं है, जो केवल देह से विशालाकार है। ये बुद्धिमान और अतीव शक्तिमान है। ऐसा कोई सामान्य वानर नहीं हो सकता। अक्षय कुमार की मृत्यु का समाचार फैलते ही मंदोदरी शोक से विकल हो गई। अब पूरा प्रकरण रावण और मंदोदरी के बड़े पुत्र मेघनाद के सम्मुख पहुंचा। सभा में रावण हनुमान के बारे में सुनकर आश्चर्य में पड़ गया कि कौन ऐसा प्राणी है जो रावण से बिना भय किए लंका में उत्पात मचा रहा है। उसने मेघनाद से कहा कि वो उस महाकपि (हनुमान) को जीवित पकड़कर लाए। वो ये जानना चाहता है कि महावानर आया कहां से है? (क्योंकि महाप्रतापी वानराज बाली तो मर चुका है तो ये कौन है जो उसे भयभीत करने यहां तक चला आया।)
मेघनाद अक्षय कुमार से अधिक अनुभवी योद्धा था। वो सभी आयुध लेकर उपवन पहुंचा। अब तक उपवन, उपवन न रहकर युद्ध का मैदान हो चुका था। मृतक राक्षसों के देह हटाया जा रहा था और घायल निशाचरों को उचित चिकित्सा के लिए चिकित्सालय ले जाया जा रहा था। यहां-वहां पेड़ उखड़े पड़े थे। मेघनाद ने देखा तो हनुमान वहीं उपस्थित थे। मेघनाद के साथ और अधिक भीषण निशाचर थे। इनको देखकर हनुमान समझ गए कि अब जो आया है वो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, पर हां ये रावण को कदापि नहीं है। हनुमान सामने आए और विशाल वृक्ष रथ पर सवार मेघनाद की ओर फेंका। मेघनाद रथ से नीचे कूद गया और इस वृक्ष से वो रथ पूरी तरह से नष्ट हो गया। महानिशाचर हनुमान की ओर दौड़े तो हनुमान ने उनको अपने शरीर रगड़-रगड़ कर यहां-वहां फेंकना शुरू कर दिया। निशाचरों की हड्डियां टूट गई। ये देखकर मेघनाद उनकी ओर दौड़ा हनुमान भी दौड़े दोनों एक -दूसरे से महागजों की तरह भिड़ गए। अब हनुमान ने एक जोरदार मुष्ठिबांधकर मेघनाद को मारा और उछलकर एक पेड़ पर जा बैठे। घूंसा पडऩे के बाद मेघनाद कुछ देर के लिए बेहोश हो गया। जब उसे होश आया तो वो समझ गया कि इस महावानर को बल ने नहीं माया और आयुध से ही हराया जा सकता है।
मेघनाद ने माया की और कई आयुध भी चलाए पर हनुमान को कोई बांध नहीं पाया। अंत में उसने ब्रम्हास्त्र साधा। यद्यपि हनुमान सहजता से उसे काट देते पर इससे देव ब्रम्हा के नाम से चलाए गए इस आयुध में विराजित प्रजापिता ब्रम्हा का अपमान हो जाता सो हनुमान ने उसका काट नहीं किया। इस आयुध से हालांकि हनुमान को कोई नुकसान नहीं हुआ पर वो बंधन में बंध गए। मेघनाद उनको लेकर रावण की सभा की ओर चल पड़ा। उसे ये नहीं मालूम था कि बंधनों में बंधे हनुमान स्वर्णिम लंका का अंत बनकर आए हैं।

वानरराज द्विविद की कहानी

त्रेता युग में भगवान श्रीहरि विष्णु के अवतार श्रीराम का जन्म हुआ। श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला। इस वनवास के दौरान लंकेश्वर रावण की बहन शूर्पणखा श्रीराम और लक्ष्मण पर मोहित हो गई और वासनातुर होकर उनके सामने जाकर सहवास का प्रस्ताव रखने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे मर्यादा की शिक्षा दी पर वो नहीं मानी। बात न मानी जाने को लेकर वे कु्रद्ध हो गई और उसने सुकुमारी सीता पर आघात कर दिया। ये देखकर लक्ष्मण क्रोधित हो गए और अच्छी समझाइश देने के लिए उसकी नाक काट दी। कटी नाक लेकर शूर्पणखा अपने भाई रावण के पास गई और पूरा वृत्तांत सुनाया। लंकाधिपति को क्रोध आ गया और राम-लक्ष्मण को उचित शिक्षा देने के लिए उसने साधु के भेष में जाकर सीता का हरण कर लिया और सीता को लंका लाकर भांति-भांति से प्रताडि़त करने लगा। वन में श्रीराम को हनुमान और सुग्रीव मिले। इनकी सहायता से श्रीराम ने वानरों की एक विशाल सेना तैयार की और लंका जाकर लंकाधिपति रावण का वध करके सीता को मुक्त करवाया। श्रीराम ने जिस विशाल वानर सेना की सहायता ली थी। इस विशाल सेना में महाकपियों की भरमार थी। इन्हींं कपियों में से एक था-द्विविद। द्विविद में दो महावानरों का बल था और इस महाकपि ने रावण के महायोद्धा सेनापति प्रहस्त का वध किया था।
विभीषण को लंकाधिपति बनाकर श्रीराम लौटने लगे तो उन्होंने सभी वानरों को उचित पुरस्कार दिया। द्विविद ने श्रीराम से फिर से मिलने की अभिलाषा प्रकट की। श्रीराम ने द्विविद को वरदान दिया कि वो द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण का रूप लेकर पृथ्वी पर लीला करेंगे तब वो उनका दर्शन कर सकेगा। इसके बाद द्विविद तपस्या में लग गए। द्विविद की तपस्या द्वापर में पूरी हुई। जब उनको पता चला कि द्वापर युग आ गया है और श्रीराम, श्रीकृष्ण का रूप लेकर द्वारिका में हैं तो वो द्वारिका की ओर दौड़ पड़े। वो तीव्र गति से द्वारिका जा पहुंचे। द्विविद को देखकर द्वारिका के रक्षकों ने उनको द्वारिका का शत्रु जाना और उन पर हमला कर दिया। श्रीकृष्ण से मिलने को आतुर द्विविद ने उनको पछाड़ा और एक ही छलांग में द्वारिका की विशाल दीवार को फांदकर अंदर चले गए। उन्होंने श्रीकृष्ण को वहां ढूंढने का प्रयास किया। द्विविद जहां पहुंचे थे वहीं कुंज के पास बलराम सोम का पान कर रहे थे वहां कई सुंदरियां भी उपस्थित थीं। श्रीकृष्ण को वहां न पाकर द्विविद क्रोधित हो गया। वो कुंज में जा घुसे। उन्होंने सुंदरियों के वस्त्र फाड़ कर उनको घायल कर दिया। अब बलराम भी क्रोधित हो गए। दो में युद्ध की सी स्थिति बन गई। बलराम ने हल उठाकर द्विविद के सिर पर दे मारा। दूसरी ओर नगर के रक्षक श्रीकृष्ण के पास पहुंचे। श्रीकृष्ण समझ गए कि द्विविद मिलने आए हैं वो कुंज की ओर दौड़े। हल का आघात होते ही द्विविद वहीं गिर गये। श्रीकृष्ण वहां पहुंचे तो उन्होंने बलराम को याद दिलाया कि ये वानरराज द्विविद हैं। उनसे मिलने की बात उन्होंने श्रीराम के रूप में कही थी तब बलराम लक्ष्मण के रूप में थे। अब बलराम चकित होकर शोकाकुल हो गए। श्रीकृष्ण ने द्विविद के सिर को अपनी गोद में रख लिया। श्रीकृष्ण को हाथ जोड़ते हुए इस महावानर ने श्रीकृष्ण की गोद में अपनी गति को पा लिया। 21 जून 2018

गुरुवार, 14 जून 2018

Eternal True

One day two monks were going somewhere. It was the season of rain. They saw a girl was standing asides the mud. O monks...O monks, she called them. How we can help you..the Senior monk asked. I want to go home but there is mud, my feet will be dirty by it. Can you help me crossing it? The Senior monk took her into his lap and dropped her to the other side. The junior monk looked all this. He thought, touching a virgin girl, took her into lap, is it right for a monk, who has taken an oath to be Celibate all his life? couldn't it be stimulate sexual desire? He reflected it all the day. In night when they went to sleep. The junior monk asked to the Elder monk- Mahamant, taking a virgin into lap, can't it be harmful for celibate of a monk. You are still wandring taking the virgin into your lap aren’t you. The junior monk ashamed. Senior monk told him- celibate is a mantel control and physical exercise. When I hold the girl my heart was pure and I had no sexual feelings. My Hear was thinking about salvation and I was taking the girl as sister or mother. But looking all this your desires arose. Which is out of celibate. Still your mind is not concentrating on right way. It is going behind the girl. My friend I took the girl in my lap and it hunted your concentration. Every thing is based on thoughts.Until thoughts are pure, there will be no Saintly. It is Sanatan Satya (Eternal True). Now the curiousness of junior was quenched.

Responsibility of Guru

This incident took place when Lord Rama was studying in GuruKul (A ancient educational institute of India where Child not only earn the Theoretical and practical knowledge but the knowledge of practical life.). One day Lord Rama was visiting in forest with His three Brothers Bharat, Lakshmana and Shatughana and other Classmate in the Congruence of Guru or their Master Guru Vshishta. They all were asking question and placing there problems before Guru Vshishta and he was solving them. Suddenly they saw a Dog lying on the Earth in deathlike condition and a number of Flea were sucking its blood . Rama asked to Vshishta- Guru jee, Why this Dog is facing such a dangerous condition? Vshishta replied- Dear disciple in its pre-birth this Dog was a Great sage and had many disciples. The sage taught them so he was responsible for their deeds. Unfortunately, all disciple took wrong way and did many sin. Being the Guru of these disciples he was also responsible for these sins. Lord Chitragupta (The God of Judgement) Gave sage the birth of Dog and his disciples were born as bloodsucking Flea (as they were subordinate to him), which are sucking his blood. Remind and inculcate Guru or master is responsible for the deed’s of his disciples.

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...