google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: मई 2020

शुक्रवार, 22 मई 2020

कहानी शरभेश्वरावतार की


हिरण्याकश्यप के वध के बाद जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवताओं ने उनके परमभक्त प्रहलाद को उनके सामने खड़ा कर दिया। प्रहलाद को देखकर क्रोध से विकल नृसिंह चैतन्य हुए। उन्होंने प्रहलाद से संवाद किया।
प्रहलाद को नीति और भक्ति का ज्ञान देकर नृसिंह वहां से चले आए। अब समय था उनके पुन: प्रभू में विलीन होने का परंतु उनका क्रोध अब तक शांत नहीं हो पाया था और यही क्रोध उनके विलीन होने में बाधक था। नृसिंह के क्रोध की ज्वालाओं से ब्रम्हांड तप्तमय होने लगा। प्रकृति में ग्रीष्म तत्व (गर्मी) बढऩे लगा। जीव-जंतु विकल हो गये। पदप(पेड़), लताएं और नदी सरोवर जलने लगे। सृष्टि का संतुलन बिगडऩे लगा। ऐसे में सभी देवताओं ने सोचा कि भगवान नृसिंह को समझाया जाए कि वो क्रोध का त्याग कर पुन: परम तत्व में विलीन हो जाएं पर जो भी ऐसा करने जाता नृसिंह उसे देखकर क्रोधित हो जाते और उसे वहां से प्राण बचाकर भागना पड़ता। अंतत: सभी देव महादेव भगवान शंकर के पास पहुंचे। भगवान शंकर ने परम गण वीरभद्र को नृसिंह को समझाने के लिए भेजा। वीरभद्र वहां पहुंचे। उन्होंने जब नृसिंह को समझाने का प्रयास किया तो क्रोधित नृसिंह उनको आघात करने के लिए दौड़े। वहां कैलाश पर बैठे भगवान शंकर यह सब देख रहे थे।
अब भगवान शिव को क्रोध भी जाग उठा। महाभयंकर पक्षीराज का रूप लिया। इस रूप के चार पैर और दो हाथ थे। यह पक्षी रूप उड़कर नृङ्क्षसह के सामने पहुंचा इस रूप को देखकर नृसिंह आक्रमक होते उससे पहले ही इस पक्षी रूप ने नृसिंह को गिरा दिया और अपने चारों पैरों से क्रमश: उनके दोनों हाथ और दोनों पैर दबा दिये और सामने के हाथों से उनके शरीर को चीर दिया। आघात होते ही नृसिंह वर्तमान में आये और उनका क्रोध दूर हो गया। इसके पश्चात भक्तवत्सल भगवान शिव के पक्षीराज रूप ने उन्हें छोड़ दिया और वो पुन: परमेश्वर में लीन हो गये।
भगवान शिव के इस महाभयंकर पक्षीराज रूप को शरभेश्वर अथवा सरभेश्वर के नाम से जाना जाता है। यह अवतार आकाश भैरव के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि इनकी साधना बहुत उग्र होती है इस कारण इनका पूजन न तो नृसिंह न ही भगवान विष्णु के सम्मुख किया जाता है और न ही नृसिंह अथवा विष्णु का पूजन इनके सम्मुख किया जाता है। अगर कोई नादान ऐसा कर दे तो उसका प्रत्यक्ष भयंकर परिणाम होता है। यूं तो यह भगवान शिव का भयंकर रूप है जो शत्रुओं का नाश करता है पर वहीं भगवान शिव के इस रूप की कथा सुनने से मानव मात्र अपने नैसर्गिक शत्रुओं यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्स्र्य सहित अन्य मनोव्याधियों पर विजय पाता है। अंतत: शिव की कथा शिव को समर्पित।
शिवार्पणमस्तु।

रविवार, 10 मई 2020

क्रोध सर्वदा तज्येत

एक बार भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यिकी तीनों घूमने निकले। चलते-चलते तीनों बहुत दूर आ गये। शाम होने लगी नगर बहुत दूर था इसलिये तीनों ने विचार किया कि रात को यहीं जंगल में किसी सुरक्षित स्थान पर रात्रि विश्राम किया जाये। सुबह नगर को लौट जायेंगे।
तीनों एक विशाल वृक्ष के नीचे पहुंचे।
यह स्थान उत्तम है क्यों कन्हैया- बलदाऊ ने पूछा।
हां, बलदाऊ ये सर्वोत्तम स्थान है, आपका क्या मत है सात्यिकी- श्रीकृष्ण ने सात्यिकी ने पूछा।
बिलकुल, यह स्थान सभी दृष्टियों से उचित है।- सात्यिकी ने दोनों का समर्थन किया।
अब स्थान चयन हो गया तो तीनों ने निश्चित किया कि सुरक्षा की दृष्टि से तीनों रात्रि में तीन पहर बारी-बारी से जागकर पहरा देंगे।
सबसे पहले बारी थी बलराम की। श्रीकृष्ण और सात्यिकी सो गये। रात्रि का भयभीत कर देने वाला समय था। जीव-जन्तुओं की भयंकर आवाजें सिहरन पैदा कर रही थी। कुछ समय पश्चात पेड़ से भूत नीचे आया और बलराम से बोला- हे महाकाय, अगर तुम मुझे इन दोनों (श्रीकृष्ण और सात्यिकी) को खा लेने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
भूत की बात सुनकर बलराम को क्रोध आ गया। रुक जा भूत तुझे अभी प्राणदंड देता हूं-ऐसा कहकर बलराम ने भूत को युद्ध की चुनौती दी जो उसने स्वीकार कर ली।
दोनों में खूब घमासान युद्ध हुआ। कुछ ही देर में भूत बलराम पर भारी पडऩे लगा। जैसे-जैसे बलराम का क्रोध बढ़ता जाता वैसे-वैसे ही भूत का आकार बढ़ता ही जाता। अब भूत ने बलराम को खूब मारा-पीटा और उठाकर पटक दिया। दूसरे के जागने की बात जानकर भूत वापस पेड़ पर चढ़ गया।
धूलधूसरित बलराम उठे। अब सात्यिकी के जागने की बारी थी वो जागे। उन्होंने बलराम को घायल देखा और पूछा- ये क्या हुआ बलदाऊ? भूत से अपनी पराजय और पिटाई से लज्जातुर बलराम बिना कुछ बोले सो गये। अब सात्यिकी जागने लगे भूत फिर से नीचे आया।
तुम कौन हो?-सात्यिकी ने पूछा।
मैं भूत हूं और इस पेड़ पर मेरा निवास है। - भूत ने उत्तर दिया।
तुम मुझसे क्या अपेक्षा करते हो?- सात्यिकी ने दूसरा प्रश्र पूछा।
महाबाहू, अगर तुम इन दोनों (बलराम और श्रीकृष्ण) को मुझे खाने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
भूत की बात सुन सात्यिकी को क्रोध आ गया।
दुष्ट, रुक जा मैं तुझे अभी उचित दंड देता हूं- सात्यिकी ने कहा।
सात्यिकी और भूत में भयंकर युद्ध शुरू हो गया। अब फिर वही हुआ। जैसे-जैसे सात्यिकी का क्रोध बढ़ता जाता वैसे-वैसे ही भूत का आकार बढ़ता ही जाता। भूत ने सात्यिकी को खूब मारा-पीटा और उठाकर पटक दिया। तीसरा पहर शुरू होने वाला था। अब श्रीकृष्ण के जागने की बारी थी। यह समझ भूत वापस पेड़ पर चढ़ गया।
अब तीसरे पहर श्रीकृष्ण उठे। सात्यिकी को घायल देखकर श्रीकृष्ण अधरों पर मंद मुस्कान लिये पूछने लगे- अरे मित्र सात्यिकी ये क्या हुआ?
सात्यिकी भला अपनी बुरी तरह हुई पिटाई की बात भगवान श्रीकृष्ण को कैसे बताते? उन्हें लज्जा का अनुभव हुआ वह भी बिना कुछ कहे सो गये।
अब भगवान श्रीकृष्ण पहरे पर बैठे। भूत फिर नीचे आया।
अरे तुम कौन?- श्रीकृष्ण मुस्कुराये।
मैं भूत हूं, इस पेड़ पर रहता हूं। अगर तुम मुझे इन दोनों (बलराम और सात्यिकी) को खाने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
मन ही मन सबकुछ समझ श्रीकृष्ण मुस्काये।
अरे..रे..रे..मित्र भूत, तुम तो बड़े दुस्साहसी निकले। मेरे सामनेे ही इस प्रकार बात करते हो। तुम्हें मेरी प्रतिक्रिया का भय भी नहीं लगता। - श्रीकृष्ण मुस्काये।
चुप रहो..पीताम्बरधारी, मेरी बात मान लो अन्यथा मुझसे युद्ध करो। भय किस बात का भय तुम्हारे इन दोनों वीरों की दुर्गति मैंने ही बनाई है। अगर मेरी बात न मानी तो तुम्हारी भी यही गति करूंगा।- भूत ने श्रीकृष्ण को डराया। अरे..बहुबली तुम तो बड़े वीर लगते हो पर बड़े मूर्ख हो, वीर कभी बातें नहीं करते वो तो युद्ध करते हैं युद्ध।- श्रीकृष्ण फिर मुस्काये।
श्रीकृष्ण की बात और बार-बार उनके अधरों की मुस्कान देखकर भूत का क्रोध आ गया।
मुझे, मेरे ही क्षेत्र में मूर्ख कहते हो। मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं- भूत ने चुनौती दी।
अब श्रीकृष्ण में और भूत में भयंकर युद्ध छिड़ गया। श्रीकृष्ण बोले- हे भूत तुम तो महाशक्तिशाली हो। तुम्हारी इस शक्ति का रहस्य क्या है?
जैसे-जैसे भूत का क्रोध बढ़ता गया वैसे-वैसे उसका आकार छोटा होता गया अंत में वो एक कीड़े के आकार का रह गया तब श्रीकृष्ण ने उसे अपने पीताम्बर में बांध लिया और प्रात: काल की प्रतीक्षा करने लगे।
सुबह बलराम और सात्यिकी की नींद खुली वो जागे। श्रीकृष्ण को देखकर वो मौन रहे।
श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा- दाऊ भैया और मित्र सात्यिकी आपके शरीर पर यह घाव कैसे?
दोनों मौन रहे। कहीं आपके मौन का कारण यह भूत तो नहीं? श्रीकृष्ण ने अपने पीताम्बर से भूत को बाहर निकाला।
हां, कन्हैया- बालराम बोले।
अब श्रीकृष्ण बोले- आपके समान ही यह भूत मेरे पास भी आया था। मेरे और इसके मध्य भी वैसा ही युद्ध हुआ जैसा आप लोगों के साथ इस भूत का हुआ था।
पर मधुसूदन आपने इसे कैसे बांध लिया? जब यह हमसे युद्ध कर रहा था तो इसका आकार बढ़ता जाता था पर आपके सामने तो यह कीड़े की भांति हो गया- सात्यिकी के प्रश्र पर बलदाऊ ने भी सहमति जताई।
मेरे प्रियों, जब यह आपसे युद्ध करता था तो यह आपको क्रोध दिलवाता था जिससे आपकी शक्ति क्षीण हो जाती थी वहीं इस भूत की शक्ति और आकार बढ़ जाता था। मैनें इस भूत को क्रोध दिलवाकर इसकी शक्ति को क्षीण कर दिया। जिससे इसका आकार घटता गया और घटकर कीड़े की भांति हो गया। प्रिय जनों क्रोध मानव की चेतन का हरण कर लेता है जिससे उसकी बुद्धि अस्थिर हो जाती है जिससे उसको उसकी शक्ति और उसके उपयोग को लेकर ज्ञान नहीं रहता और वह बलवान होने के स्थान पर शक्तिहीन हो जाता है। इसलिये क्रोध कभी भी नहीं करना चाहिये। मन को हर स्थिति में स्थिर रखना चाहिये और जो क्रोध कर ऐसा करते हैं उनका परिणाम इस भूत की भांति होता है- ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने पीताम्बर से निकाल कर भूत को भूमि पर गिराया और उसे पैरों से कुचल दिया।
इस कथा से शिक्षा मिलती है कि क्रोध नहीं करना चाहिये और मन को सर्वदा स्थिर रखकर इसके आवेग से मुक्त रखना चाहिये। जिस पर प्रकार अतिबलशाली विक्षिप्त गजराज एक छोटे से अंकुश बाध्य हो जाता है उसी प्रकार बलशाली पर क्रोध से युक्त मानव भी पराजित हो जाता है।

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...