संस्कार/Sanskara
यह ब्लॉग धार्मिक और प्रेरक कथाओं के बारे में है। यह ब्लॉग संस्कार, धार्मिक कथा, धार्मिक कथाएं, पौराणिक कथाएं, भारतीय पौराणिक कथा, हिन्दू पौराणिक कथा तथा धार्मिक कथाओं का संग्रह है। This Blog is about Religious and Motivational Stories. It contains sanskar, dharmik katha, dharmik kathaen, pauranik katha, indian mythology stories, hindu mythology, religious stories.
सोमवार, 19 जनवरी 2026
खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है।
माय मास्टर्स वाइज, दिल कुत्ते की तरह भागकर वहां जाता है। आवाज सुनता है, उनको नहीं पाता, सुस्त होकर बैठ जाता है।
मास्टर, जिंदगी को बनाने वाला, आकार देने वाला, रास्ता दिखाने वाला, फिक्रमंद। आंखों से सब कहने वाला कि बोलने की जरूरत ही क्या?
हम देख ही नहीं पाते, हमारे पीछे वो हमेशा हैं। आगे तो हम हैं न....वर्ना तो वो आगे चलकर सारी परेशानी खुद ही झेल लेते। शब्दों से परे उनको बयां करना...क्योंकि शब्द समझे जा सकते हैं, भावों को भी समाहित कर लेते हैं पर वो इतनी ऊंचाई पर हैं कि बस उनको देख सकते हैं। उनको लफ्जों के सांचे में कैसे ढालें?
जो पास है....उस तक नजर नहीं करते, उसका प्यार मन की उलझनों में बाहर ही रोका जाता है। वर्ना वो तो दिल का सुकून है। उसकी पनाह में जाकर बस, खुशी है....बयान के परे। रब, दिली उलझनों से बाहर लाए ताकि उस पनाह में चंद पल चैन से सो जाएं। लिपट जाए। अपने दिल के रिकार्ड को उनके लिए बजाएं क्योंकि उनको भी अल्फाजों में ढाला नहीं जा सकेगा। हम अल्फाजों में खुद को ढाल ले, अपनी गफलतों को बयां कर दें, पर रुहानी सुकूं को नहीं...कभी नहीं....।
रविवार, 4 जनवरी 2026
Shri Hari Stotram with Hindi Meaning | श्री हरि स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित | Powerful Morning Prayer
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🙏 Shri Hari Stotram is a sacred Sanskrit hymn dedicated to Lord Vishnu, the protector and sustainer of the universe. This video presents the stotram with clear Hindi meanings, making it easy to understand and reflect upon each divine verse.
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Daily morning prayer
Enhancing spiritual routine
Deepening your connection with Lord Hari
📿 Benefits of listening:
Brings peace and positivity
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✨ Meaningful devotion starts with understanding. Let the divine vibrations and powerful translations guide your day.
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श्री हरि स्तोत्रम् हिंदी अर्थ सहित
जगज्जालपालं कचतकण्ठमालं, शरच्चन्द्रभालं महादैत्यकालम्।
नभोनीलकायं दुरावारमायं, सुपद्मासहायं भजेहं भजेहम् ।। १।।
अर्थ: जो समस्त जगत के रक्षक हैं, जो गले में चमकता हार पहने हुए है, जिनका मस्तक शरद ऋतु में चमकते चन्द्रमा की तरह है और जो महादैत्यों के काल हैं। आकाश के समान जिनका रंग नीला है, जो अजय मायावी शक्तियों के स्वामी हैं, देवी लक्ष्मी जिनकी साथी हैं उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।
सदाम्भोधिवासं गलत्पुष्पहासं जगत्संनिवासं शतादित्यभासम् ।
गदाचक्रशस्त्रं लसत्पीतवस्त्रं हसच्चारुवक्रं भजेहं भजेहम् ।।२।।
अर्थ: जो सदा समुद्र में वास करते हैं,जिनकी मुस्कान खिले हुए पुष्प की भांति है, जिनका वास पूरे जगत में है,जो सौ सूर्यों के समान प्रतीत होते हैं। जो गदा,चक्र और शस्त्र अपने हाथों में धारण करते हैं, जो पीले वस्त्रों में सुशोभित हैं और जिनके सुंदर चेहरे पर प्यारी मुस्कान हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।
रमाकण्ठहारं श्रुतिव्रातसारं जलांतर्विहारं धराभारहारम्।
चिदानन्दरूपं मनोज्ञस्वरूपं धृतानेकरूपं भजेहं भजेहम् ।।३।।
अर्थ: जिनके गले के हार में देवी लक्ष्मी का चिन्ह बना हुआ है, जो वेद वाणी के सार हैं, जो जल में विहार करते हैं और पृथ्वी के भार को धारण करते हैं। जिनका सदा आनंदमय रूप रहता है और मन को आकर्षित करता है, जिन्होंने अनेकों रूप धारण किये हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारम्बार भजता हूँ।
जराजन्महीनं परानंदपीनं समाधानलीनं सदैवानवीनं।
जगज्जन्महेतुं सुरानीककेतुं त्रिलोकैकसेतुं भजेहं भजेहम् ।।४।।
अर्थ: जो जन्म और मृत्यु से मुक्त हैं, जो परमानन्द से भरे हुए हैं, जिनका मन हमेशा स्थिर और शांत रहता है, जो हमेशा नूतन प्रतीत होते हैं। जो इस जगत के जन्म के कारक हैं। जो देवताओं की सेना के रक्षक हैं और जो तीनों लोकों के बीच सेतु हैं। उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।
कृताम्नायगानं खगाधीशयानं विमुक्तेर्निदानं हरारातिमानम्।
स्वभक्तानुकूलं जगद्दृक्षमूलं निरस्तार्तशूलं भजेहं भजेहम् ।।५।।
अर्थ: जो वेदों के गायक हैं। पक्षीराज गरुड़ की जो सवारी करते हैं। जो मुक्तिदाता हैं और शत्रुओं का जो मान हारते हैं। जो भक्तों के प्रिय हैं, जो जगत रूपी वृक्ष की जड़ हैं और जो सभी दुखों को निरस्त कर देते हैं। मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।।
समस्तामरेशं द्विरेफाभकेशं जगद्विम्बलेशं ह्रदाकाशदेशम्।
सदा दिव्यदेहं विमुक्ताखिलेहं सुवैकुंठगेहं भजेहं भजेहम् ।।६।।
अर्थ: जो सभी देवताओं के स्वामी हैं, काली मधुमक्खी के समान जिनके केश का रंग है, पृथ्वी जिनके शरीर का हिस्सा है और जिनका शरीर आकाश के समान स्पष्ट है। जिनका शरीर सदा दिव्य है, जो संसार के बंधनों से मुक्त हैं, बैकुंठ जिनका निवास है, मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।।
सुरालीबलिष्ठं त्रिलोकीवरिष्ठं गुरुणां गरिष्ठं स्वरुपैकनिष्ठम्।
सदा युद्धधीरं महावीरवीरं भवांभोधितीरं भजेहं भजेहम् ।।७।।
अर्थ: जो देवताओं में सबसे बलशाली हैं, त्रिलोकों में सबसे श्रेष्ठ हैं, जिनका एक ही स्वरूप है, जो युद्ध में सदा विजय हैं, जो वीरों में वीर हैं, जो सागर के किनारे पर वास करते हैं, उन भगवान विष्णु को मैं बारंबार भजता हूँ।
रमावामभागं तलानग्ननागं कृताधीनयागं गतारागरागम्।
मुनीन्द्रैः सुगीतं सुरैः संपरीतं गुणौघैरतीतं भजेहं भजेहम् ।।८।।
अर्थ: जिनके बाईं ओर लक्ष्मी विराजित होती हैं। जो शेषनाग पर विराजित हैं। जो राग-रंग से मुक्त हैं। ऋषि-मुनि जिनके गीत गाते हैं। देवता जिनकी सेवा करते हैं और जो गुणों से परे हैं। मैं उन भगवान विष्णु को बारम्बार भजता हूँ।
।। फलश्रुति ।।
इदं यस्तु नित्यं समाधाय चित्तं पठेदष्टकं कष्टहारं मुरारेः।
स विष्णोर्विशोकं ध्रुवं याति लोकं जराजन्मशोकं पुनरविंदते नो।।९।।
अर्थ: भगवान हरि का यह अष्टक जो कि मुरारी के कंठ की माला के समान है,जो भी इसे सच्चे मन से पढ़ता है वह वैकुण्ठ लोक को प्राप्त होता है। वह दुख,शोक,जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।
।। इति श्रीपरमहंसस्वामिब्रह्मानंदविरचितं श्रीहरिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ।।
अर्थ: यहां पर श्रीपरमहंसस्वामी ब्रह्मानन्द द्वारा रचित यह श्रीहरि स्तोत्र समाप्त हुआ।
सोमवार, 26 अप्रैल 2021
महावीर हनुमान का आगमन
यह कथा विभिन्न धार्मिक कथाओं का आधार लेकर लिखी गई है। हनुमानजी से जुड़ी कथाओं में विभिन्नताओं के चलते विविधता दृष्टिगत होती है। इस कारण कई प्रसंगों में भिन्नता हो सकती है।
देवों में प्रथम पूज्य भगवान श्रीगणेश को सपरिवार नमन करते हुए मैं सभी श्रृष्टियों को भय रहित करने वाले और सर्वदा मंगल करने वाले रामभक्त हनुमान की कथा प्रारंभ करता हूं।
ये कहानी त्रेतायुग से भी पूर्व की है जब अमृत मंथन हुआ था। अमृत मंथन के बाद जब भगवान शिव ने हलाहल विष का पान कर उसे कंठ में धारण कर लिया। इसके बाद अमृत निकला। भगवान विष्णु ने छल से देवगणों को अमृत का पान करवा दिया। राक्षसों का कांजी यानी मदिरा मिली। इसी प्रकरण में दैत्यराज बलि के महाबली सेनापति राहू का शीश काट दिया गया। बलि को वामन के वरदान से पाताल लोक का राज्य मिला। सबकुछ कुशलता से पूर्ण हो गया। सब ओर खुशहाली छा गई। देवलोक में नित्य आनंदोत्सव मनने लगा। सब ओर प्रसन्नता थी पर एक शक्ति अभी भी कष्ट की अग्रि में जल रही थी, तप रही थी और एक महान घटना घटित होने वाली थी।
सभी लोकों का भ्रमण करने वाले और जाने-अंजाने महान क्रियाओं को जन्म देने वाले देवर्षि नारद विष्णु लोक में पहुंचे। विष्णु यहां आनंद से थे। देवर्षि बोले- श्री हरि विष्णु को प्रणाम। प्रभु आपके द्वारा सबका कल्याण किया गया। सब ओर कुशल-मंगल हो गया पर......पर क्या देवर्षि भगवान विष्णु ने पूछा। पर उस महाशक्ति का क्या जो जगत कल्याण के लिए विष पीकर क्षण-क्षण कष्ट की महाअग्रि में जल रही है और उनके अंदर ही आपकी भक्ति भी पीडि़त हो रही है। श्री हरि विष्णु नारद जी की बात को समझ गए। देवर्षि हम आपकी बात समझ गए। आप निश्चिंत होकर जाइए। मेरी भक्ति को होने वाले कष्ट को मैं स्वयं हरूंगा। नारद हरि नाम लेते हुए चले गए। अब नारद स्वर्ग पहुंचे और देवराज इंद्र को अपने विष्णु लोक भ्रमण के बारे में बताया और कहा कि वो तैयार रहे उन्हें एक महान कार्य को पूर्ण करना है। निश्चित समय श्रीहरि विष्णु ने मोहिनी का रूप धरा, वो रूप जो साक्षात् राति और काम देव को भी मोहित कर डाले। विष्णु इस रूप के साथ कैलाश पर्वत पर जा पहुंचे। वायू मद में बहने लगी और चारों ओर सुगंध फैल गई। भगवान शिव का ध्यान टूट गया, उन्होंने मोहिनी को देखा। जगत का पालन और संहार करने वाली दो महाशक्तियों का योग हुआ और इसी योग में शिव के अंदर से दिव्य ज्योतिपुंज का उदय हुआ। देवराज इंद्र इस दिव्य ज्योतिपुंज को लेकर नगमुनि के आश्रम में पहुंचे और उनको बताया कि ये ज्योतिपुंज शिव का अंश है और इस ज्योतिपुंज को रक्षार्थ उनके यज्ञकुंड में प्रतिष्ठित किया जाना है। नगमुनि प्रसन्न हुए और प्रतिष्ठापन की आज्ञा दी। इस तरह वो दिव्य ज्योतिपुंज यज्ञकुंड में प्रतिष्ठित हो गया।
यहाँ स्वर्ग लोक में आनंद ही आनंद था। यहाँ देवजाति, किन्नर, यक्ष, अप्सराएं आदि सुख से थे। सदैव यहाँ आनंद और भोग के कार्यक्रम चलते ही रहते थे। स्वर्ग की सभी अप्सराएं इसमें समान रूप से भाग लेती थीं इन्हीं अप्सराओं में एक अद्वितीय सुंदरी थीं जिनका नाम था पुंजिकस्थला (कुछ जगह इनका नाम कुंजिकस्थला भी मिलता है)। पुंजिकस्थला स्वर्ग की प्रतिष्ठित अप्सरा थी। उनके अद्वितीय सौंदर्य की ख्याति भी समस्त लोकों में व्याप्त थी। देव लोक के शक्तिशाली और सबसे अधिक चपल देवता पवनदेव उन पर मोहित हो गए। दूसरी ओर ऐसा ही प्रेम पुंजिकस्थला के मन में भी उत्पन्न हो गया और दोनों प्रेम मार्ग के पथिक बन गए। दोनों यहां-वहां भ्रमण करते और प्रेम में लीन हो जाते। उनका प्रेम भी देव लोक में चर्चा का विषय बन गया था। एक बार पुंजिकस्थला और पवनदेव की भेंट देवर्षि नारद से हो गई। दोनों ने उनसे आशीर्वाद मांगा। आशीर्वाद देते हुए नारद जी ने कहा, पुंजिकस्थला और पवन देव आप दोनों का प्रेम उचित है प्रेम में श्रृंगार है, रस है, रति है परंतु प्रेम में विरह भी होती है और वेदना भी। यह कहकर नारद जी ने दोनों के मन में शंका उत्पन्न कर दी। दोनों चिंतित हो गए।
देवर्षि नारद विष्णुलोक गए और श्रीहरि विष्णु को अभिमान वश कहने लगे कि वो संसार और मोह माया से परे हैं। विष्णु जान गए कि नारद अभिमानी हो गए हैं तब उन्होंने माया रची और विश्व मोहिनी का स्वयंवर हुआ। नारद भी उसके वर बनकर वहां पहुंच गए। उनका वानर मुख देखकर सभी हंसने लगे और विश्व मोहिनी का विवाह किसी अन्य से हो गया। इस बात से क्रोधित नारद विष्णुलोक की ओर चल पड़े।
पुंजिकस्थला और पवनदेव दोनों भी स:शंक थे। वो दोनों शंका के समाधान के लिए नारद जी को ढूंढने लगे और शीघ्र ही नारद उन्हें विष्णुलोक जाते हुए मिल गए। वो क्रोधित थे। दोनों ने नारदजी को रोका प्रणाम कर शंका का समाधान करना चाहा तो क्रोधित नारद ने उन्हें का कि उनका प्रेम विरह को प्राप्त होगा और पीड़ा ही इसका अंत होगी। इसके बाद नारद विष्णुलोक गए जहां पता चला कि विश्वमोहिनी विष्णु की माया थी और जिससे उनका विवाह हुआ वो श्रीहरि विष्णु ही थे। क्रोधवश नारद ने उन्हें शाप दिया कि श्रीराम अवतार में वो अपनी पत्नी से विरह भोगेंगे और जिसका मुंह उन्होंने उनको दिया था उन्हीं की सहायता से पुन: अपनी पत्नी से मिलेंगे। विष्णु ने मुस्कुराकर उनके शाप को स्वीकार कर लिया। मोह से निकलते ही नारद दुखी हो गए और क्षमा मांगने लगे। हरिविष्णु ने कहा कि ये घटना काल का नियम होकर होनी ही थी इसलिए शोक न करो। नारद संतुष्ट हो गए।
नारद एक दिन हरिनाम लेते हुए जा रहे थे कि पुन: उन्हें पुंजिकस्थला मिलीं जिन्होंने एक बार फिर उसी शंका का समाधान करना चाहा तो नारद ने कहा कि चिंता न करो जो होगा जगतकल्याण के लिए ही होगा। पुंजिकस्थला प्रसन्न हो गईं और पवनदेव को ये बात बताने के लिए उन्हें ढूंढने लगी। पुंजिकस्थला पवन देव को ढूंढते-ढूंढते नगमुनि के आश्रम में जा पहुंचीं। उन्होंने जैसे ही वहाँ यज्ञकुंड में प्रज्जवलित अग्रि के अंतर में उभर रही शिवांश की ज्योति को देखा तो उन्हें मन में सहज ही यह इच्छा पैदा हुई कि काश, यह ज्योति उनका अंश होकर उनके गर्भ में होती। वो उसे एकटक निहारने लगीं तभी नगमुनि वहाँ पहुंचे। वो पुंजिकस्थला को देखकर क्रोधित हो गए और उनको वहाँ से निकल जाने का आदेश दिया। वो वहाँ से चली गईं। वो एक नदी के किनारे पहुँची ही थीं कि उन्होंने पवनदेव को वहाँ देखा उन्होंने उनको बताया कि नारदजी से सभी शंकाओं का समाधान कर दिया है। जो कुछ होगा जगतकल्याण के लिए ही होगा। पवनदेव उससे बहुत प्रसन्न हुए और कुंजिकस्थला सहित जलक्रीड़ा करने लगे। आनंद मग्र वो जलक्रीड़ा में रत थे इस बात से अनभिज्ञ कि कुछ ही समय में भयंकर अनर्थ होने वाला था।
वो दोनों जलक्रीड़ा और प्रेम में मग्र थे और वहीं से कुछ दूर महर्षि मातंग स्नान व पूजा में रत थे। पुंजिकस्थला ने आनंद पूर्वक जल हवा में उछाला जो मातंग ऋषि पर जा गिरा। उनकी पूजा भंग हो गई। वो, पवनदेव व पुंजिकस्थला के पास पहुँचे और जल को अशुद्ध और पूजा भंग करने की बात कही। इस बात पर विवाद हो गया और पुंजिकस्थला उनसे लडऩे लगी। क्रोधित होकर मातंग ने रूपवान अप्सरा से वानरी हो जाने का शाप दिया। वो वानरी हो गई। पवनदेव ने क्षमायाचना की तो मातंग पसीज गए और कहा कि ये एक ऐसे महान कार्य में सहायक होगी जिससे समस्त ब्रम्हांडो का कल्याण होगा और सभी श्रृष्टियाँ निर्भय हो जाएंगी।
वानरी पुंजिकस्थला वन में भाग गईं और पवनदेव मुँह लटकाकर स्वर्ग वापस आ गए। मार्ग में उन्हें नारद मुनि मिले जिन्होंने उनको अकेला पाकर पुंजिकस्थला के बारे में पूछा। दुखी पवनदेव ने उनको सब कुछ कह सुनाया और कहा कि यदि नारदजी को अनिष्ट का आभास था तो उन्होंने पुंजिकस्थला को सही बात क्यों नहीं बताई? नारदजी बोले, पवनदेव मैंने तुम दोनों को संकेत बहुत पहले ही दे दिया था। समझदार को इशारा ही काफी होता है। स्वर्ग पहुंचने पर पुंजिकस्थला को न पाकर देवराज इंद्र ने उनको स्वर्ग से बहिष्कृत कर दिया। दु:खित पवनदेव शिवशंकर की शरण में कैलाश पर चले गए।
कुछ समय बाद एक महान राजा केशरी शिकार करते हुए मातंग ऋषि के आश्रम में जा पहुँचे। राजा ने मातंग ऋषि के आश्रम में पहुँचकर वहाँ की शांति भंग कर दी। क्रोधित होकर मातंग ऋषि ने शाप दिया कि वानरों की तरह उत्पात मचाने वाले राजा, जाओ वानर हो जाओ। केशरी वानर हो गए और उसी पेड़ पर जा चढ़े जहां पूर्व से पुंजिकस्थला वानरी रूप में बैठी थीं।
उन दोनों को देखकर मातंग ऋषि दुखित हुए कि शाप से इन दोनों की ये कैसी गति हो गई। ये दोनों नासमझ थे पर वो तो समझदार थे उन्होंने उन दोनों को ये कैसा शाप दे दिया? मातंग ऋषि ने उन दोनों को देखकर कहा, हे पुंजिकस्थला और केशरी आपका जन्म अब पूर्ण हुआ अब दोनों अपने अगले जन्म की ओर प्रस्थान करो और उस महान कार्य के हेतु बनो जो समस्त सृष्टियों को भयरहित करेगा और कल्याणकारी होगा। दोनों ने अपने नवजीवन की ओर प्रस्थान किया। इसके साथ ही एक महान और अनंत महाक्रिया का आरंभ हो गया।
पुंजिकस्थला का जन्म एक महान भूपति राजा महेंद्र की पुत्री अंजनी के रूप में हुआ और केशरी का जन्म वानरराज वात्सुकि के पुत्र के रूप में हुआ। दूसरी ओर भगवान शिवशंकर ने देवराज इंद्र को बुलाया और पवनदेव को पुन: वापस ले जाने और देवलोक में उचित स्थान दिलवाने का आदेश दिया। पवनदेव देवलोक लौट गए।
इधर एक दुष्ट राक्षस का आतंक चारों ओर फैला हुआ था जिसका नाम था शंभसाधन (इसके भाई कुंभसाधन को महावीर हनुमान ने बाल्यकाल में ही मार दिया था।) शंभसाधन एक दिवस देवी अंजनी का हरण कर ले गया। केशरी ने उसका वधकर अंजनी को मुक्त करवाया। बाद में दोनों का विवाह धूमधाम से हुआ। एक दिवस महादेव ने पवनदेव को बुलाया और आदेश दिया कि वे नगमुनि के आश्रम में प्रतिष्ठित शिवांश को देवी अंजनी के गर्भ में स्थापित कर दें। पवनदेव ने ऐसा ही किया। कुछ समय बाद चैत्र पूर्णिमा के सूर्योदय काल में समस्त सृष्टियों को भयरहित करने वाले शंकरसुवन पवनपुत्र, अंजनीसुत, केशरीनंदन महावीर हनुमान का जन्म हुआ।
शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021
जब श्रीराम ने साधा हनुमान पर ब्रम्हास्त्र
त्रेता युग में काशी क्षेत्र में राजा सौभद्र का शासन था। सौभद्र का भगवान श्रीराम में बड़ा अनुराग था। जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया इसके बाद उन्होंने सोच कि क्यों न भगवान श्रीराम के दर्शनकर कृतार्थ हो जाये। ऐसा विचार करके सौभद्र भगवान श्रीराम से मिलने के लिये निकल पड़े। ठीक उसी समय भगवान श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र भी अपनी मंडली सहित उनसे मिलने के लिये जा रहे थे।
चलते-चलते सांध्य हो गई। काशी नरेश सौभद्र ने सोचा कि अयोध्या अभी दूर है इसलिये रात्रि के विश्राम के लिये कहीं रुक जाया जाये। ऐसा विचार करके वो एक शिवमंदिर में रुक गये। दूसरी ओर विश्वामित्र भी सांध्य हो आई देखकर उसी मंदिर में जा पहुंचे। शिवमंदिर विश्वामित्र के जयकारों से गूंज उठा। महास्वरों को सुनकर सौभद्र वहां आये। शिवमंदिर में विश्वामित्र के जयकारों को सुनकर वो क्रोधित हो गये।
वो बोले- शिवमंदिर में किसकी जयकार कर रहे हो? महादेव से बड़ा कौन हो सकता है? कौन दुष्ट शिव की जगह अपने जयकारे लगवा रहा है?
सौभद्र की बात सुनकर विश्वामित्र को क्रोध आ गया।
वो क्रोधित होकर बोले- तुम मुझे जानते नहीं हो? इस अपमान के लिये तुम्हे दंड मिलेगा।
दंड, पाखंडी साधू शिव के समकक्ष स्वयं को रखकर तूने स्वयं अपना अपमान करवाया है- सौभद्र को भी क्रोध आ गया।
अब विश्वामित्र विचलित हो गये।
राजन, अब तुम्हे तुम्हारी उद्दंडता के लिये श्रीराम ही दंड देंगे।
साधू, वो न्याय स्वरूप हैं। मुझे भय नहीं- सौभद्र निश्चिंत होकर बोले।
इसके बाद दोनों अपने-अपने पथ पर चले गये।
दूसरे दिन दोनों अयोध्या पहुंचे। अपरान्ह में महावीर हनुमान श्रीराम के पास पहुंचे और भगवान श्रीराम से अपने माता-पिता से मिलने जाने के लिये अनुमति मांगी। भगवान श्रीराम ने अनुमति देदी। इसके पश्चात सौभद्र श्रीराम से मिले इसके बाद विश्वामित्र वहां आये। विश्वामित्र ने श्रीराम को सौभद्र की शिकायत की और आदेश दिया कि वो उसे दंडित करें। गुरु के आदेश से बंधे श्रीराम ने कहा कि वो सौभद्र को दंड देंगे पर भगवान श्रीराम सौभद्र की बात को जानते थे कि उन्होंने कुछ गलत तो नहीं किया। श्रीराम इसी पसोपेश में थे कि प्रकार गुरु का वचन भी निभ जाये और सौभद्र को दंड भी न मिले।
रात्रि काल में सौभद्र भयभीत थे और उन्हें निद्रा नहीं आ रही थी। इसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने सौभद्र से चिंतित होने का कारण पूछा तो सौभद्र ने पूरी कथा सुनाकर उनसे सहायता मांगी। सौभद्र की बात सुनकर नारद जी बोले- राजन अब तो तुम्हारी सहायता केवल और केवल महावीर हनुमान ही कर सकते है पर वो तो यहां हैं ही नहीं।
कहां हैं वो? भयभीत सौभद्र ने पूछा।
वो तो अपने माता-पिता से मिलने पंपापुरी चले गये हैं- नारद जी ने बताया।
सौभद्र ने नारद जी के चरण पकड़ लिये।
देवर्षि अब आप ही कोई युक्ति बताइये।
नारद जी सौभद्र को युक्ति बताई और सौभद्र रात्रि में ही पंपापुरी की ओर चले गये।
पवनवेग अश्व पर सवार राजा सौभद्र शीघ्र ही वहां पहुंच गये। प्रात: हो चुकी थी पर हनुमान अभी वहां नहीं पहुंचे थे। सौभद्र ने पंपापुरी जाकर देवी अंजनी के पैर पकड़ लिये।
हे..माता मेरी रक्षा करो..रक्षा करो। सौभद्र की बात सुनकर देवी अंजनी को आश्चर्य हुआ।
हे राजन मैं तुम्हें नहीं जानती। कौन हो तुम? मैं तुम्हारी रक्षा भला कैसे कर सकती हूं?- अंजनी देवी बोलीं।
बस मां अपना पुत्र जानकर सिर पर वरदहस्त रख दो और वचन दो कि आपके पुत्र हनुमान मेरी रक्षा करेंगे।
पुत्र पर तुमने कौन सा अपराध किया है? और कौन तुम्हें दंडित करने वाला है?- अंजना देवी ने पूछा।
नारद जी ने बता दिया था कि यदि देवी अंजना को पता चला कि श्रीराम दंडित करने वाले हैं तो वो और हनुमान श्रीराम के न्यायविधान में हस्तक्षेत्र नहीं करेंगे। इसलिये उन्हें केवल माता से हां कहलवाना है।
सौभद्र बोले- मां, बस हां कह दो। मेरी रक्षा करो मां।
छल-कपट से मुक्त माता अंजना कुछ कहती उससे पहले ही वहां हनुमान आ गये और देवी अंजना के मुख से वचन निकल गया ''हां।ÓÓ हनुमान से मिलकर देवी अंजनी ने बताया कि कोई आया है और तुम्हारी सहायता के लिये प्रतिक्षित है। हनुमान सोचने लगे कौन आया है?
काशी नरेश सौभद्र को देखकर हनुमान अचरज में पड़ गये। सौभद्र ने हनुमान को पूरी कथा बता दी।
श्रीराम ने वचन दे दिया है अब हनुमान क्या करें? पर यहां देवी अंजनी ने भी वचन दे दिया है। एक ओर प्रभु का वचन है और दूसरी ओर माता का विश्वास कि हनुमान सौभद्र का कष्ट हरेंगे। अब ज्ञान गुन सागर अंजनी कुमार ने तुरंत युक्ति लगाई और सौभद्र को लेकर एक सरोवर के किनारे पहुंचे और उनसे कहा कि सरोवर में खड़े होकर श्रीराम के नाम का जाप शुरू कर दें। इसके बाद वो मनवेग से अयोध्या की ओर प्रस्थित हुए।
यहां अयोध्या में हाहाकार मच गया। विश्वामित्र श्रीराम से बोले कि दंड के भय से सौभद्र भाग निकला है। अब श्रीराम क्या न्याय करेंगे? क्या दंड मिलेगा अपराधी को।
श्रीराम ने कहा कि उन पर विश्वास करें। अपराधी को अपराध का दंड मिलेगा। अब विश्वामित्र और क्रोधित हो गये और श्रीराम से बोले कि वो उन्हें वचन दें कि काशी नरेश सौभद्र को अब केवल मृत्युदंड मिलेगा। गुरु के वचन के आगे विवश श्रीराम ने वचन दिया कि सौभद्र को मृत्युदंड ही मिलेगा।
कुछ समय में हनुमान वहां आये और श्रीराम से कहा- हे प्रभु मैंने आज तक अपनी सेवा के प्रतिउत्तर में कुछ नहीं मांगा पर आज आवश्यकता है क्या वह कुछ देंगे?
श्रीराम विचलित थे और यह जानने को आतुर भी थे कि हनुमान आकस्मात वापस क्यों आ गये और आते से ऐसा क्यों कहा? पर वो बोले- मांगो हनुमान..क्या चाहिये।
हे प्रभु वचन दीजिये कि जब कोई सच्चे मन से आपके नाम का जाप करेगा तो उसकी रक्षा स्वयं मैं करूंगा और जब मैं रक्षा करूंगा तो श्रृष्टि की कोई भी रक्षा उसका अहित नहीं कर सकेगी।
तथास्तु- श्रीराम ने कहा।
श्रीराम से वरदान पाकर हनुमान सौभद्र के पास पहुंचे और उसके सामने वायु में स्थिर होकर श्रीराम नाम का जाप करने लगे।
यहां विश्वामित्र को पता चला कि काशी नरेश सौभद्र हनुमान के रक्षण में हैं तो वो क्रोधातुर हो गये और श्रीराम के पास जाकर हनुमान और सौभद्र दोनों की शिकायत करने लगे। उन्होंने कहा कि वो उनके साथ चलकर सौभद्र को मृत्युदंड दें। श्रीराम गुरु के आदेश को मानकर उनके साथ चले गये।
सरोवर पर पहुंचकर श्रीराम ने महावीर हनुमान से कहा कि वो वहां से हट जायें। क्योंकि वो सौभद्र को मृत्युदंड देने आये हैं। महावीर हनुमान ने कहा कि वो श्रीराम के वचन के अनुसार सौभद्र का रक्षण कर रहे हैं। वो श्रीराम के वचन का पालन कर रहे हैं। वो नहीं हटेंगे।
अब श्रीराम ने बाण संधित कर चलाया पर वो बाण बीच मार्ग में बैठे हनुमान से ठकराकर वापस आ गया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। श्रीराम का बाण निष्प्रभाव हो गया।
अब श्रीराम ने दूसरा बाण चलाया वो भी पहले बाण की ही भांति वापस लौट गया। शिव और ब्रम्हदेव का ध्यान भंग हो गया और देवता भयभीत होकर भूलोक को देखने लगे। अब दो अमोघ बाणों के प्रभावहीन होने से विश्वामित्र क्रोधित हो गये। यह देखकर श्रीराम ने ब्रम्हास्त्र का संधन किया।
अब तीनों लोकों में त्राहिमाम..त्राहिमाम होने लगा। यह देखकर देवर्षि नारद वहां प्रकट हो गये।
हे नारायण स्वरूप श्रीराम ब्रम्हास्त्र का संधन मत कीजिये। हनुमान आपके ही वचन पर आपके नाम जपने वाले सौभद्र का रक्षण कर रहा है। अगर श्रीराम का ब्रम्हास्त्र श्रीराम के वचन पर चल गया तो महाविनाश हो जायेगा। हनुमान आपके नाम की शक्ति के कवच से सज्जित सौभद्र का आपके वचन के अनुसार ही रक्षण कर रहे हैं जिसका संसार में कोई अनिष्ट नहीं कर सकता-नारद जी बोले।
अब विश्वामित्र को भी समझ में आ गया कि जो कुछ हो रहा है ठीक नहीं है।
वो बोले- रुक जाओ श्रीराम। यह उचित नहीं है। तुम सौभद्र को छोड़ दो। परंतु गुरुदेव, श्रीराम आगे बोले- आपके वचन का क्या होगा? यह सोच विश्वामित्र सोच में पड़ गये। वाकपटु हनुमान यह देखकर बोले- महर्षि आप सौभद्र को क्षमा कर दीजिये। क्षमा से बड़ा कुछ नहीं। हनुमान की बात सुनकर विश्वामित्र ने सौभद्र को क्षमा कर दिया। यह देखकर श्रीराम मुस्कुराने लगे। जब श्रीराम वहां से लौटने लगे तब हनुमान ने उनसे क्षमा मांगी। इस पर श्रीराम बोले- हनुमान वो तुम्हारी धृष्टता नहीं वो तुम्हारी राम भक्त के प्रति वत्सलता थी। तुमने ऐसा कर मेरी ही महिमा को बढ़ा दिया है। आगे वो हनुमान से बोले- हनुमान यह प्रसंग तो पूर्ण हो गया पर मेरा वचन अमर हो गया। अब से जो कोई भी पवित्र मन से मेरे नाम का जाप करेगा। उसकी रक्षा स्वयं तुम करोगे और जब तुम रक्षा करोगे तो संसार की कोई भी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकेगी। तुमने मेरे हाथों से एक अनर्थ होने से बचाया। तुम धन्य हो हनुमान। यह सुनकर हनुमान बोले- जय श्रीराम जय जय श्रीराम। हनुमान श्रीराम के हृदय से लग गये।
बुधवार, 3 फ़रवरी 2021
हनुमान-बाली का महायुद्ध
यह कथा सुनी-सुनाई प्रचलित लोककथाओं पर आधारित है।
एक बार हनुमान पिता केशरी और माता अंजनी से मिलकर आकाश मार्ग से जा रहे थे तभी उन्हें देवर्षी नारद मिल गये। देवर्षी नारद ने आशीर्वाद देने के बाद हनुमान से देवी अंजनी और केशरी का कुशलमंगल पूछा। इसके पश्चात सुग्रीव के बारे में चर्चा की। वार्ता करते हुए नारद जी ने हनुमान से कहा कि वे वचन दें कि यदि कभी हनुमान का बाली से सामना हो जाये तो वो उसका वध नहीं करेंगे। क्योंकि सुग्रीव का पक्ष लेने के कारण हनुमान से बाली शत्रुता रखता था। और संभव था कि जब वे मिलेंगे तो बाली उन पर प्रहार करने से नहीं चूकेगा। वैसे भी बाली को पिता इंद्र का वरदान था कि शत्रु की आधी शक्ति उसमें आ जायेगी। इस वरदान के बल पर वो महाबली दशग्रीव रावण को युद्ध में हरा चुका था जिससे उसका उत्साह भी प्रबल था।
हनुमान ने नारद जी से कहा कि उनकी बाली से शत्रुता है ही नहीं। अपने गुरु सूर्यदेव को दी गुरुदीक्षा के वचन के कारण वो सुग्रीव के साथ हैं। वो कभी बाली का वध तो क्या उस पर प्रहार भी नहीं करेंगे। पर नारद ये सब क्यों कह रहे हैं? क्या भविष्य के गर्भ में को दुर्घटना छुपी हुई है? नारद हंसे- नारायण..नारायण, मेरा काम तो जगत कल्याण करना और सचेत करना है। कहीं कोई दुर्घटना न हो जाये बस यही बात है। वैसे भी बाली का वध हनुमान के हाथों होना विधि का विधान नहीं है।
हनुमान ने नारद जी को आश्वस्त किया और चले गये। पर उन्हें यह नहीं पता था कि बहुत शीघ्र अनर्थ होने ही वाला था।
हनुमान के पिता केशरी देवी अंजना के साथ नित्य ही भ्रमण पर निकला करते थे। एक दिन वो देवी अंजना के साथ वनभ्रमण कर रहे थे तभी वहां बाली आ गया। वो अपने क्षेत्र का निरीक्षण कर रहा था। केशरी को देखकर वो क्रोधित हो गया और समझ गया कि हनुमान सुग्रीव के पास हैं और यही उचित समय है जब केशरी पर प्रहार कर हनुमान को सुग्रीव का समर्थन करने का दंड दिया जा सकता है। उसने केशरी को युद्ध के लिये आमंत्रित किया। केशरी वृद्ध थे और बाली के हाथों वीरगति को प्राप्त करते इस बात को अंजना समझ गईं और इससे पूर्व कि बाली प्रहार करता उन्होंने अपने पुत्र हनुमान का स्मरण किया- पुत्र हनुमान..शीघ्र आओ। शीघ्र आओ हनुमान लला।
सुग्रीव के पास खड़े हनुमान को देवी अंजना की आवाज सुनाई दी। हनुमान त्वरित अंतर्धान हो। मन के वेग से चल पड़े। बाली गदा उठाकर आगे बढ़ा ही था कि उसके सामने गर्जना करते हुए हनुमान आ खड़े हुए।
बाली..मेरे वृद्धकाय पिता पर क्या प्रहार करता है? क्षमता है तो मुझसे लड़। मेरे न होने का अनुचित लाभ उठाने का परिणाम अब तू भुगतेगा। -हनुमान गर्जे।
बाली बोला- तेरी आधी शक्ति मुझ में आ ही गई है हनुमान। मुझे तेरा भय नहीं। अच्छा हुआ तू खुद ही आ गया। अब मैं तुझे सुग्रीव का पक्षधर होने का दंड दूंगा।
हनुमान बोले- तेरा गर्व और शिर दोनों आज खंड-खंड हो जायेंगे।
दोनों में भीषण युद्ध शुरू हो गया। हनुमान रूद्र थे और रूद्र की शक्ति का पार नहीं है। बाली ने रूद्र के क्रोध को जगा दिया था। हनुमान ने बाली का चित कर दिया और उसके हाथ उखाड़कर उसका वध करने को प्रवृत्त होने लगे। तभी नारद जी की मधुर आवाज गूंज उठी- नारायण..नारायण..नारायण। हनुमान को अपना वचन याद आ गया और उन्होंने बाली को छोड़ दिया। बाली दुवर्चन कहता हुआ वहां से चला गया। हनुमान ने केशरी और माता अंजनी को हुए कष्ट की क्षमा मांगी और उन्हें निवास तक छोड़कर पुन ऋष्यमूक पर्वत की ओर चले गये।
गुरुवार, 4 जून 2020
कहानी याज्ञवल्क्य की
बहुत पुरानी बात है एक ऋषि थे वैशंपायन, वैशंपायन महर्षि वेद व्यास के शिष्य थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उनके आश्रम में बहुत से शिष्य अध्ययनरत थे। सभी योग्य थे और ज्ञान में उनका सानी न था पर इन शिष्यों में भी याज्ञवल्क्य के समान कोई योग्य न था।
याज्ञवल्क्य विद्यार्थियों के लिये एक आदर्श के समान थे। ब्रम्ह मुहूर्त में यानी आज के समय में तड़के तीन बजे के करीब उठकर वो नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाते थे। नित्यकर्म यानी शौच जाना और स्नान करना। इसके पश्चात वो गुरु के दर्शन और ज्ञानार्जन के लिये उनके पास जाते थे। इतनी सुबह तो स्वयं वैशंपायन भी उठ न पाते थे।
याज्ञवल्क्य मन और परिश्रम से अध्ययन करते और उसके बाद आश्रम के कामों में भी पूरा-पूरा हाथ बंटाते। साथी मित्रों के प्रति उनका स्वभाव सदैव सहयोगात्मक होता था। उनको जो कुछ भी ज्ञान होता वो दूसरों से अधिक होता था फिर भी वो उसका वृथा (बेकार) प्रदर्शन नहीं करते थे। जो सत्य होता था वो उसका पक्ष लेते थे और असत्य को कभी ग्रहण नहीं करते थे भले ही कितनी ही उच्च कोटी का व्यक्ति उसका समर्थन कर रहा हो। उनके तर्क सशक्त और शास्त्र सम्मत होते थे। वो पाठ्य को प्रायोगिक जीवन में रखकर उसकी उपयोगिता का अनुसंधान भी करते थे। (यानी थ्योरी को यूं नहीं रट लेते थे उसका प्रैक्टिकल उपयोग भी देखते थे।) जब तक विषय समझ में न आ जाता वो उसका मन लगाकर अध्ययन करते। मनस, वाच और कर्म से अध्ययन करते। (यानी विषय को समझकर, बोलकर और फिर उसका उपयोग कर उसे समझते। इसे आजकल के हिसाब से ऐसे समझें पहले पढ़कर समझते थे फिर बोलकर याद करते थे इसके बाद लिखकर मन में बिठा लेते थे।) उनका ध्यान एकाग्र होता था इसलिये उनको कोई भी पाठ सरलता से समझ आ जाता था। आश्रम में आने वाले सभी लोगों और साधुओं की वो सेवा करते थे।
स्वर्ग से देवता भी उनकी स्तुति गाते थे कि ऐसा शिष्य तो भाग्य से ही मिलता है वैशंपायन भाग्यवान हैं। धन्य हैं ऐसे माता-पिता जिनकी संतान ऐसी सतोगुणी है।
एक बार वैशंपायन के आश्रम में कुछ साधु आये। वैशंपायन उनके साथ बैठकर चर्चा कर रहे थे और सामने कुछ दूर पर याज्ञवल्क्य अपने कर्म में तल्लीन थे। ये देखकर एक साधु वैशंपायन से बोला- वैशंपायन तुम धन्य हो जो ऐसा सुशिष्य पाया है तुमने। दूसरा बोला- सत्य है, हमारे शिष्य तो एक कार्य में प्रवीण हैं तो दूसरे में अकुशाग्र पर ये तो सभी कार्यों में श्रेष्ठ है। तीसरा वैशंपायन का बचपन का साथी था वो उनको छेड़ते हुए बोला- वैशंपायन, अपने बचपन में तो तुम भी ऐसे कुशाग्र न थे जैसा तुम्हारा शिष्य है यह तो गुरुत्तम है। गुरुत्तम-वैशंपायन का मन क्रोध से भर गया।
अब वैशंपायन अपने ही शिष्य याज्ञवल्क्य से ईर्ष्या करने लगे। बिना किसी कारण के वो उसे डांट देते। कभी दंड भी दे देते। दिन-प्रतिदिन यह बढ़ता ही गया पर याज्ञवल्क्य शांतिपूर्वक अपने अध्ययन में लगे रहे।
वैशंपायन की इस धृष्टता से देवता और त्रिदेवों सहित सभी देवियां और स्वयं वैशंपायन के पित्रों का मन व्यथित हो गया। याज्ञवल्क्य जैसे सुशिष्य का अपमान स्वयं परमेश्वर का अपमान है क्योंकि परमेश्वर ही ज्ञान का प्रकाश है। ऐसा पाप करके वैशंपायन अपने लिये अनंत नर्कों के द्वार एक साथ खोल रहे हैं। यह तो वास्तव में महापाप है।
एक दिन वैशंपायन को आश्रम से बाहर जाना पड़ा। वो याज्ञवल्क्य और अन्य शिष्यों को आदेश दे गये कि उनकी अनुपस्थिति में आश्रम का पूरा ध्यान रखा जाये।
वैशंपायन के जाने के बाद उस क्षेत्र के राजा का अनुचर आया और उसने बताया कि राजा का स्वास्थ्य अचानक खराब हो गया है। वैशंपायन चलकर उनका उपचार करें। कार्य में शीघ्रता की जाये। सभी ने विचार किया कि गुरु की अनुपस्थिति में यह कार्य केवल और केवल याज्ञवल्क्य ही कर सकते हैं। अंतत: याज्ञवल्क्य मंत्रसिद्ध जल लेकर राजा का उपचार करनेे चले गये।
राजा को आशा थी कि स्वयं वैशंपायन आयेंगे पर जब उसे पता चला कि उनका शिष्य याज्ञवल्क्य आया है तो उसने निर्दोष याज्ञवल्क्य को काफी समय वृथा बिठाकर रखा फिर उसका अपमान कर उन्हें निकल जाने का आदेश दिया।
याज्ञवल्क्य राजा को दंड दे सकते थे पर उन्होंने गुरु का मान रखते हुए वहां से प्रस्थान कर दिया। जब वो लौट रहे थे तो उन्होंने मंत्रसिद्ध जल को घुड़साल की छत पर फेंक दिया ताकि जल पैरों में आकर अपमानित न हो। जल के छत पर गिरते ही वहां दिव्य पुष्पों से लदी लताएं उत्पन्न हो गईं। जिसकी सुगंध यत्र-तत्र फैलने लगी। जब राजा को यह पता चला तो वह स्वयं यह देखने आया। ऐसा चमत्कार तो स्वयं वैशंपायन न कर सकते थे। राजा ने सोचा यह तो उचित नहीं हुआ। सत्ता के मद में चूर राजा ने आदेश दिया- जाओ उस बटुक ब्राम्हण को वापस बुलाकर लाओ।
राजा का अनुचर वापस वैशंपायन के आश्रम पहुंचा और याज्ञवल्क्य को वापस राजा के पास जाने का आदेश सुनाया।
वैशंपायन वापस लौट आये थे। उन्होंने भी याज्ञवल्क्य को वापस जाने के लिये कहा पर स्वाभिमानी याज्ञवल्क्य ने राजा के पास वापस जाने से मना कर दिया और कहा कि उपचार के लिये राजा को स्वयं आना चाहिये। उन्होंने कहा कि राजा ने उनका अपमान किया है जो अनुचित था। राजा को क्षमाप्रार्थी होकर आश्रम आना चाहिये क्योंकि ये याज्ञवल्क्य का ही नहीं बल्कि आश्रम और स्वयं वैशंपायन का अपमान है पर वैशंपायन को यह बात अनुचित लगी। उन्होंने याज्ञवल्क्य को बाध्य करते हुए कहा कि आश्रम का धन राजा की ओर से आता है वो अगर नहीं गये तो राजा को क्रोध आ जायेगा और आश्रम को आर्थिक हानि होगी।
याज्ञवल्क्य ने कहा कि गुरुदेव, हम जो धन पाते हैं वो ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिये पाते हैं यह राजा का अनुग्रह नहीं है। हम उनकी अनुचित प्रभुताई से बाध्य क्यों हों? अपमान का परिहार क्षमा है, दंभ नहीं हम राजहठ से पराजित क्यो हों? उसे दंभ न दिखाकर क्षमाप्रार्थी होकर यहां आना चाहिये।
वैशंपायन को लगा कि याज्ञवल्क्य की बात है तो सही पर यही अवसर है इसके ज्ञान का दंभ (जो कि वैशंपायन के मन का भ्रम से उत्पन्न दोष था) तोडऩे का। ईष्र्या तो पहले से ही उनके मन में थी पर जब याज्ञवल्क्य का स्वाभिमान अखंड रहा तो उन्होंने निर्दोष याज्ञवल्क्य को शाप दिया कि उन्होंने उसे जो ज्ञान अबतक दिया है वो उसे विस्मृत कर देंगे यानी भूल जायेंगे।
अब तक जो ज्ञान याज्ञवल्क्य ने परिश्रम कर अर्जित किया था वह उसे भूल गये। दुखित याज्ञवल्क्य को कष्ट तो हुआ पर उन्होंने साहस का त्याग नहीं किया। वो जानते थे कि ज्ञान वेदों से निकला है और वेदों की माता गायत्री हैं। इसलिये याज्ञवल्क्य ने देवी गायत्री की घोर तपस्या प्रारंभ कर दी। इस तपस्या को देखकर सभी नतमस्तक हो गये। अंत में देवी गायत्री याज्ञवल्क्य के सम्मुख प्रकट हुईं और आशीर्वाद दिया कि उनको वेदों का समस्त ज्ञान प्राप्त होगा और साथ ही उनकी तपस्या के कारण उनको गायत्री के चौबीस ऋषियों में स्थान प्राप्त होगा।
इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने अपनी निरंतर साधना से ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त किया साथ ही ऐसा महान स्थान प्राप्त किया जो कि किसी के लिये भी असंभव नहीं तो दुर्लभ है। इसके पश्चात याज्ञवल्क्य ने वेदों को समझने के लिये उपनिषद, संहिता और कई ग्रंथों की रचना की।
आज के विद्यार्थियों को याज्ञवल्क्य से शिक्षा लेना चाहिये। शिक्षा को प्राप्त करना भी एक तपस्या है और यह तपस्या तभी सार्थक है जब हम पूर्णता प्राप्त करें। केवल पुस्तकों के ज्ञान को पूर्ण नहीं माना जा सकता जब तक कि वो प्रायोगिक तौर पर कार्यान्वयन के योग्य न हो। विद्या वही है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर दे।
शुक्रवार, 22 मई 2020
कहानी शरभेश्वरावतार की
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