google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: जुलाई 2018

मंगलवार, 17 जुलाई 2018

मनस की जलन का अंत क्षमा

बहुत समय पहले एक गांव में एक आदमी रहता था। उसकी दो पत्नियां थीं। पहली पत्नी से उसको कोई संतान नहीं थी पर दूसरी से उसको संतान थी। पति का सारा स्नेह केवल और केवल दूसरी पत्नी पर ही रहता था। पहली पत्नी ये देखकर खून का घूंट पीकर भीतर ही भीतर जलती जाती थी। कुछ समय बाद तीनों की मृत्यु हो गई। समय चक्र के अनुसार पति-पत्नी का तो दूसरा जन्म हो गया पर पहली पत्नी को ईर्ष्या के चलते न तो मोक्ष मिला न ही उसका जन्म ही हो पाया। उसने एक भयंकर यक्षिणी का रूप ले लिया और यहां-वहां भटकने लगी। समय के अनुसार दूसरी पत्नी का विवाह हुआ। समय के साथ वो गर्भवती हुई और मायके प्रसव के लिए आई जब वो अपने शिशु को लेकर लौट रही थी उसकी पूर्व जन्म की सौतन जो यक्षिणी का रूप ले चुकी थी आई और उसका शिशु लेकर भाग गई। उसने कदाचित अपने पूर्वजन्म की सौतन को पहचान लिया था। वो स्त्री दु:खी हो गई। दूसरी बार फिर वो गर्भवती हुई इस बार भी जन्म के बाद उसके शिशु को लेकर यक्षिणी भाग निकली। तीसरी बार जब वो अपने शिशु को लेकर लौट रही थी यक्षिणी फिर आई। इस बार स्त्री अपने शिशु को लेकर अंर्तनाद करते हुए भागी। कोई बचाओ...मेरे शिशु को बचाओ। यक्षिणी भी उसके पीछे भागी जा रही थी। कुछ ही दूर आश्रम में भगवान बुद्ध उपदेश दे रहे थे। करुणक्रंदन करते हुए वो स्त्री बुद्ध के पास पहुंची और अपने शिशु को उनके चरणों में रख बोली- हे देव रक्षा करो। वो यक्षिणी पूर्व में मेरे दो शिशुओं का अंत कर चुकी है। आप ही रक्षा कर सकते हैं...रक्षा करो। किंचित भयभीत न हो, शांति रखो...तुम और तुम्हारा शिशु यहां सुरक्षित हैं- बुद्ध ने आश्वस्त किया। स्त्री शांत हुई।
यक्षिणी जैसी ही आश्रम के द्वार पर पहुंची वहां खड़े एक देव ने तुरंत उसे रोक दिया। बुद्ध ने यक्षिणी को भीतर बुलाया और पूरी बात पूछी। इसके बाद बुद्ध ने कहा- देखो यक्षिणी वो काल व्यतीत हो चुका है, जब तुमने इस स्त्री से शत्रुता रखी। ये तुम्हारी सौतन थी। ये इसका पुनर्जन्म है। इसका नया जीवन है। इससे पुरानी शत्रुता निभाने का अर्थ क्या है? तुम्हारी ईर्ष्या ने ही तुम्हारा मार्ग बाधित किया। तुम्हे न तो मोक्ष मिला न ही पुनर्जन्म। तुम यूं ही भटक रही हो, पीडि़त हो रही हो। तुम्हारी व्यथा का केवल एक शमन है- क्षमा कर दो। जो कुछ पूर्व में तुम्हारे साथ हुआ है उसके लिए। अपने हृदय से क्षमा कर दो सभी को जिन्होंने तुमको जन्म भर पीडि़त किया हो तो ही तुम्हे शांति मिलेगी। मनस की जलन का उपचार और अंत एक ही है- क्षमा। बुद्ध का उपदेश पाकर यक्षिणी से सभी को क्षमा कर दिया और उसे शांति प्राप्त हो गई।

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

श्रीगणेश और यशोदानंदन की परीक्षा

भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी का स्वर मन को मोहित करने वाला और वशीकरण का प्रभाव रखने वाला होता था। जब वो बांसुरी बजाते थे तो स्वर्ग की अप्सराएं, देवियां और समस्त देवगण मोहित हो उठते थे तो मानव की बात ही कहां है?
भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की विशेषता की चर्चा देवलोक में होती रहती थी। एक बार भगवान श्रीगणेश के पास ये बात जा पहुंची। पार्वती नंदन भगवान श्रीगणेश बिना परीक्षण किये किसी बात को मानते न थे, इसलिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
देवलोक से योजनों दूर पृथ्वी पर गोकुल में एक दिन ग्वाले गाउओं को चराते हुए आगे निकल गए। मन को मोहित करने वाली सुगंधित शीतल पवन चल रही थी। श्रीकृष्ण ने देखा आकाश में श्याम (काले) मेघ भी आ रहे थे। ये मनोरम दृश्य देखकर वहीं छोटे पर्वत पर बैठकर श्रीकृष्ण बांसुरी बजाने लगे। कुछ समय पश्चात बांसुरी के स्वर को विराम लगा ही था कि गले में मृदंग लटकाकर एक मल्लकाय (पहलवान जैसा) व्यक्ति वहां आया- तू कृष्ण है न। भगवान श्रीकृष्ण उसको देखकर कुछ डरे- हां, पर तुम कौन हो? मैं, हा...हा..हा, मैं हूं मृदंग केसरी...मेरी मृदंग ध्वनि सबका मनहरण कर लेती है। सुना है तेरी बांसुरी भी मनमोहिनी है...चलो मुझ में और तुम में एक प्रतिस्पर्धा हो जाए..याद रहे किसी भी भांति से रुकना नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण कुछ समझ गए- चलो...हम तैयार हैं। अब स्पर्धा शुरू हुई।
श्रीकृष्ण जो धुन बजाते। मृदंग केसरी मृदंग पर तुरंत उसका अनुगमन करने लगते। श्रीकृष्ण कुछ परेशान हुए फिर उन्होंने तुरंत स्वर बदलते हुए गजप्रिय ध्वनि में बांसुरी को स्वर दिया। अब मृदंग केसरी मृदंग बजाना भूलकर उन्मत्त-आनंदित होकर गज (हाथी) की भांति नाचने लगा। अहो...क्या आनंद है? बहुत देर तक श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते रहे और मृदंग केसरी नाचता रहा। जब आनंदातिरेक (आनंद की अति) हो गया तब श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाने को विराम दिया। अब मृदंग केसरी मुस्कुराया। शिवसुत गौरी नंदन को प्रणाम- श्रीकृष्ण बोले। मृदंग केसरी भी मुस्कुरा कर बोले- यशोदा नंदन श्रीकृष्ण की जय। अब गजमुख गजानन मृदंग केसरी से अपने असली स्वरूप में आ गए। कृष्ण ने श्रीगणेश से पांडवों के हालचाल पूछे। श्रीगणेश ने उनको पांडवों की व्यथा और भविष्य में होने वाली घटनाओं और महाभारत के बारे में भी बताया। इसके बाद श्रीगणेश अपने लोक को प्रस्थान कर गए।

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

शकुनि का प्रतिशोध

गुरु द्रोण के आश्रम में किशोरवय दुर्योधन और भीम आमने-सामने हुए तो भीम ने हंसकर दुर्योधन को घट की विधवा का पुत्र कहा और उसका उपहास किया। दुर्योधन सोच में पड़ गया कि वो घट का पुत्र कैसे हो सकता है? वो गांधारी के पास गया और उससे पूरी बात जानना चाही। न चाहते हुए भी गांधारी ने उसे बताया- पुत्र आर्य धृतराष्ट्र से विवाह से पूर्व मेरी कुंडली में ग्रहदोष था इसका निवारण करने के लिए मेरा विवाह एक पानी से भरे मटके से करवाया गया। उसे नष्ट करने के बाद मेरा विवाह आर्य धृतराष्ट्र से संपन्न हुआ। ये जानकर दुर्योधन का क्रोध चरम पर आ गया। उसने गांधार नरेश सुबल और उसके पुत्र यानी अपने वृद्ध नाना और युवा मामा शकुनि को कारावास में डाल दिया। कारावास में युवा शकुनि और उसके मृत होते पिता दु:ख भोग रहे थे। एक रात सुबल की सांसें उखडऩे लगी। शकुनि उनके प्राण बचाना चाहता था पर वो कुछ भी नहीं कर सकता था। अपने पिता को क्षण-क्षण कष्टमय मृत्यु की ओर जाता देखकर शकुनि का हृदय फटा जा रहा था। वो स्वयं को अशक्त समझ रहा था और व्यथित था। सुबल ने शकुनि से कहा- पुत्र दुर्योधन ने हमारे साथ घोर अन्याय किया है। एक वृद्ध और एक निर्दोष को कारावास देकर उसने महापाप किया है। हमने जो कुछ किया उसमें गांधारी का हित ही था। पुत्र मैं मर रहा हूं पर दुर्योधन के प्रति मेरे हृदय से केवल और केवल शाप ही निकल रहे हैं। पुत्र तुझे इसका प्रतिशोध लेना होगा। प्रतिशोध। शकुनि ने पूछा- वो किस तरह पिताश्री। पुत्र मेरी मृत्यु के पश्चात मेरी उंगलियों की अस्थियों से तुम चौसर के पांसे बना लेना। वो पांसे केवल तुम्हारे इशारे भर से तुम्हारी मनोएच्छा के अनुरूप चलने लगेंगे। ये पांसे ही दुर्योधन का अंत करेंगे। बस, आगे समय तुम्हे स्वयं ही निर्देशित करेगा कि तुमको क्या करना है? इतना कहते हुए सुबल की मृत्यु हो गई। दुर्योधन ने सोचा कि शकुनि का विशेष दोष नहीं है और मातामह (नाना) की मौत से उसको लगा कि इतनी सजा इनके लिए काफी है। इस कांड से दुर्योधन का अपयश भी फैलने लगा सो उसने शकुनि को छोड़ दिया। जैसा सुबल ने कहा था शकुनि ने उनकी अस्थियों से पांसे बनाए। ये पांसे केवल और केवल शकुनि की इच्छा के अनुसार अपना अंक दर्शित करते थे। जब पांडव और कौरव द्यूतक्रीड़ा (जुआ खेलने) बैठे तो इन्हीं पांसों से शकुनि ने कौरवों को जिताया क्योंकि वो जानता था कि कौरव अधर्म कर रहे हैं और ये अधर्म उनका सर्वांत कर देगा। कौरव ये सोच रहे थे कि वो जीत रहे हैं पर शकुनि जानता था कि ये जीत उनके भावी अंत का सृजन कर रही है। 23 जून 2018

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...