google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: जब श्रीराम ने साधा हनुमान पर ब्रम्हास्त्र

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

जब श्रीराम ने साधा हनुमान पर ब्रम्हास्त्र

त्रेता युग में काशी क्षेत्र में राजा सौभद्र का शासन था। सौभद्र का भगवान श्रीराम में बड़ा अनुराग था। जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया इसके बाद उन्होंने सोच कि क्यों न भगवान श्रीराम के दर्शनकर कृतार्थ हो जाये। ऐसा विचार करके सौभद्र भगवान श्रीराम से मिलने के लिये निकल पड़े। ठीक उसी समय भगवान श्रीराम के गुरु महर्षि विश्वामित्र भी अपनी मंडली सहित उनसे मिलने के लिये जा रहे थे।
चलते-चलते सांध्य हो गई। काशी नरेश सौभद्र ने सोचा कि अयोध्या अभी दूर है इसलिये रात्रि के विश्राम के लिये कहीं रुक जाया जाये। ऐसा विचार करके वो एक शिवमंदिर में रुक गये। दूसरी ओर विश्वामित्र भी सांध्य हो आई देखकर उसी मंदिर में जा पहुंचे। शिवमंदिर विश्वामित्र के जयकारों से गूंज उठा। महास्वरों को सुनकर सौभद्र वहां आये। शिवमंदिर में विश्वामित्र के जयकारों को सुनकर वो क्रोधित हो गये।
वो बोले- शिवमंदिर में किसकी जयकार कर रहे हो? महादेव से बड़ा कौन हो सकता है? कौन दुष्ट शिव की जगह अपने जयकारे लगवा रहा है?
सौभद्र की बात सुनकर विश्वामित्र को क्रोध आ गया।
वो क्रोधित होकर बोले- तुम मुझे जानते नहीं हो? इस अपमान के लिये तुम्हे दंड मिलेगा।
दंड, पाखंडी साधू शिव के समकक्ष स्वयं को रखकर तूने स्वयं अपना अपमान करवाया है- सौभद्र को भी क्रोध आ गया।
अब विश्वामित्र विचलित हो गये।
राजन, अब तुम्हे तुम्हारी उद्दंडता के लिये श्रीराम ही दंड देंगे।
साधू, वो न्याय स्वरूप हैं। मुझे भय नहीं- सौभद्र निश्चिंत होकर बोले।
इसके बाद दोनों अपने-अपने पथ पर चले गये।
दूसरे दिन दोनों अयोध्या पहुंचे। अपरान्ह में महावीर हनुमान श्रीराम के पास पहुंचे और भगवान श्रीराम से अपने माता-पिता से मिलने जाने के लिये अनुमति मांगी। भगवान श्रीराम ने अनुमति देदी। इसके पश्चात सौभद्र श्रीराम से मिले इसके बाद विश्वामित्र वहां आये। विश्वामित्र ने श्रीराम को सौभद्र की शिकायत की और आदेश दिया कि वो उसे दंडित करें। गुरु के आदेश से बंधे श्रीराम ने कहा कि वो सौभद्र को दंड देंगे पर भगवान श्रीराम सौभद्र की बात को जानते थे कि उन्होंने कुछ गलत तो नहीं किया। श्रीराम इसी पसोपेश में थे कि प्रकार गुरु का वचन भी निभ जाये और सौभद्र को दंड भी न मिले।
रात्रि काल में सौभद्र भयभीत थे और उन्हें निद्रा नहीं आ रही थी। इसी समय देवर्षि नारद वहां पहुंचे। उन्होंने सौभद्र से चिंतित होने का कारण पूछा तो सौभद्र ने पूरी कथा सुनाकर उनसे सहायता मांगी। सौभद्र की बात सुनकर नारद जी बोले- राजन अब तो तुम्हारी सहायता केवल और केवल महावीर हनुमान ही कर सकते है पर वो तो यहां हैं ही नहीं।
कहां हैं वो? भयभीत सौभद्र ने पूछा।
वो तो अपने माता-पिता से मिलने पंपापुरी चले गये हैं- नारद जी ने बताया।
सौभद्र ने नारद जी के चरण पकड़ लिये।
देवर्षि अब आप ही कोई युक्ति बताइये।
नारद जी सौभद्र को युक्ति बताई और सौभद्र रात्रि में ही पंपापुरी की ओर चले गये।
पवनवेग अश्व पर सवार राजा सौभद्र शीघ्र ही वहां पहुंच गये। प्रात: हो चुकी थी पर हनुमान अभी वहां नहीं पहुंचे थे। सौभद्र ने पंपापुरी जाकर देवी अंजनी के पैर पकड़ लिये।
हे..माता मेरी रक्षा करो..रक्षा करो। सौभद्र की बात सुनकर देवी अंजनी को आश्चर्य हुआ।
हे राजन मैं तुम्हें नहीं जानती। कौन हो तुम? मैं तुम्हारी रक्षा भला कैसे कर सकती हूं?- अंजनी देवी बोलीं।
बस मां अपना पुत्र जानकर सिर पर वरदहस्त रख दो और वचन दो कि आपके पुत्र हनुमान मेरी रक्षा करेंगे।
पुत्र पर तुमने कौन सा अपराध किया है? और कौन तुम्हें दंडित करने वाला है?- अंजना देवी ने पूछा।
नारद जी ने बता दिया था कि यदि देवी अंजना को पता चला कि श्रीराम दंडित करने वाले हैं तो वो और हनुमान श्रीराम के न्यायविधान में हस्तक्षेत्र नहीं करेंगे। इसलिये उन्हें केवल माता से हां कहलवाना है। सौभद्र बोले- मां, बस हां कह दो। मेरी रक्षा करो मां।
छल-कपट से मुक्त माता अंजना कुछ कहती उससे पहले ही वहां हनुमान आ गये और देवी अंजना के मुख से वचन निकल गया ''हां।ÓÓ हनुमान से मिलकर देवी अंजनी ने बताया कि कोई आया है और तुम्हारी सहायता के लिये प्रतिक्षित है। हनुमान सोचने लगे कौन आया है?
काशी नरेश सौभद्र को देखकर हनुमान अचरज में पड़ गये। सौभद्र ने हनुमान को पूरी कथा बता दी।
श्रीराम ने वचन दे दिया है अब हनुमान क्या करें? पर यहां देवी अंजनी ने भी वचन दे दिया है। एक ओर प्रभु का वचन है और दूसरी ओर माता का विश्वास कि हनुमान सौभद्र का कष्ट हरेंगे। अब ज्ञान गुन सागर अंजनी कुमार ने तुरंत युक्ति लगाई और सौभद्र को लेकर एक सरोवर के किनारे पहुंचे और उनसे कहा कि सरोवर में खड़े होकर श्रीराम के नाम का जाप शुरू कर दें। इसके बाद वो मनवेग से अयोध्या की ओर प्रस्थित हुए।
यहां अयोध्या में हाहाकार मच गया। विश्वामित्र श्रीराम से बोले कि दंड के भय से सौभद्र भाग निकला है। अब श्रीराम क्या न्याय करेंगे? क्या दंड मिलेगा अपराधी को।
श्रीराम ने कहा कि उन पर विश्वास करें। अपराधी को अपराध का दंड मिलेगा। अब विश्वामित्र और क्रोधित हो गये और श्रीराम से बोले कि वो उन्हें वचन दें कि काशी नरेश सौभद्र को अब केवल मृत्युदंड मिलेगा। गुरु के वचन के आगे विवश श्रीराम ने वचन दिया कि सौभद्र को मृत्युदंड ही मिलेगा।
कुछ समय में हनुमान वहां आये और श्रीराम से कहा- हे प्रभु मैंने आज तक अपनी सेवा के प्रतिउत्तर में कुछ नहीं मांगा पर आज आवश्यकता है क्या वह कुछ देंगे?
श्रीराम विचलित थे और यह जानने को आतुर भी थे कि हनुमान आकस्मात वापस क्यों आ गये और आते से ऐसा क्यों कहा? पर वो बोले- मांगो हनुमान..क्या चाहिये।
हे प्रभु वचन दीजिये कि जब कोई सच्चे मन से आपके नाम का जाप करेगा तो उसकी रक्षा स्वयं मैं करूंगा और जब मैं रक्षा करूंगा तो श्रृष्टि की कोई भी रक्षा उसका अहित नहीं कर सकेगी।
तथास्तु- श्रीराम ने कहा।
श्रीराम से वरदान पाकर हनुमान सौभद्र के पास पहुंचे और उसके सामने वायु में स्थिर होकर श्रीराम नाम का जाप करने लगे।
यहां विश्वामित्र को पता चला कि काशी नरेश सौभद्र हनुमान के रक्षण में हैं तो वो क्रोधातुर हो गये और श्रीराम के पास जाकर हनुमान और सौभद्र दोनों की शिकायत करने लगे। उन्होंने कहा कि वो उनके साथ चलकर सौभद्र को मृत्युदंड दें। श्रीराम गुरु के आदेश को मानकर उनके साथ चले गये।
सरोवर पर पहुंचकर श्रीराम ने महावीर हनुमान से कहा कि वो वहां से हट जायें। क्योंकि वो सौभद्र को मृत्युदंड देने आये हैं। महावीर हनुमान ने कहा कि वो श्रीराम के वचन के अनुसार सौभद्र का रक्षण कर रहे हैं। वो श्रीराम के वचन का पालन कर रहे हैं। वो नहीं हटेंगे।
अब श्रीराम ने बाण संधित कर चलाया पर वो बाण बीच मार्ग में बैठे हनुमान से ठकराकर वापस आ गया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। श्रीराम का बाण निष्प्रभाव हो गया। अब श्रीराम ने दूसरा बाण चलाया वो भी पहले बाण की ही भांति वापस लौट गया। शिव और ब्रम्हदेव का ध्यान भंग हो गया और देवता भयभीत होकर भूलोक को देखने लगे। अब दो अमोघ बाणों के प्रभावहीन होने से विश्वामित्र क्रोधित हो गये। यह देखकर श्रीराम ने ब्रम्हास्त्र का संधन किया।
अब तीनों लोकों में त्राहिमाम..त्राहिमाम होने लगा। यह देखकर देवर्षि नारद वहां प्रकट हो गये।
हे नारायण स्वरूप श्रीराम ब्रम्हास्त्र का संधन मत कीजिये। हनुमान आपके ही वचन पर आपके नाम जपने वाले सौभद्र का रक्षण कर रहा है। अगर श्रीराम का ब्रम्हास्त्र श्रीराम के वचन पर चल गया तो महाविनाश हो जायेगा। हनुमान आपके नाम की शक्ति के कवच से सज्जित सौभद्र का आपके वचन के अनुसार ही रक्षण कर रहे हैं जिसका संसार में कोई अनिष्ट नहीं कर सकता-नारद जी बोले।
अब विश्वामित्र को भी समझ में आ गया कि जो कुछ हो रहा है ठीक नहीं है।
वो बोले- रुक जाओ श्रीराम। यह उचित नहीं है। तुम सौभद्र को छोड़ दो। परंतु गुरुदेव, श्रीराम आगे बोले- आपके वचन का क्या होगा? यह सोच विश्वामित्र सोच में पड़ गये। वाकपटु हनुमान यह देखकर बोले- महर्षि आप सौभद्र को क्षमा कर दीजिये। क्षमा से बड़ा कुछ नहीं। हनुमान की बात सुनकर विश्वामित्र ने सौभद्र को क्षमा कर दिया। यह देखकर श्रीराम मुस्कुराने लगे। जब श्रीराम वहां से लौटने लगे तब हनुमान ने उनसे क्षमा मांगी। इस पर श्रीराम बोले- हनुमान वो तुम्हारी धृष्टता नहीं वो तुम्हारी राम भक्त के प्रति वत्सलता थी। तुमने ऐसा कर मेरी ही महिमा को बढ़ा दिया है। आगे वो हनुमान से बोले- हनुमान यह प्रसंग तो पूर्ण हो गया पर मेरा वचन अमर हो गया। अब से जो कोई भी पवित्र मन से मेरे नाम का जाप करेगा। उसकी रक्षा स्वयं तुम करोगे और जब तुम रक्षा करोगे तो संसार की कोई भी शक्ति उसका अहित नहीं कर सकेगी। तुमने मेरे हाथों से एक अनर्थ होने से बचाया। तुम धन्य हो हनुमान। यह सुनकर हनुमान बोले- जय श्रीराम जय जय श्रीराम। हनुमान श्रीराम के हृदय से लग गये।

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