यह ब्लॉग धार्मिक और प्रेरक कथाओं के बारे में है। यह ब्लॉग संस्कार, धार्मिक कथा, धार्मिक कथाएं, पौराणिक कथाएं, भारतीय पौराणिक कथा, हिन्दू पौराणिक कथा तथा धार्मिक कथाओं का संग्रह है। This Blog is about Religious and Motivational Stories. It contains sanskar, dharmik katha, dharmik kathaen, pauranik katha, indian mythology stories, hindu mythology, religious stories.
बुधवार, 25 सितंबर 2019
पितृ रहस्यम्-भाग 1
भादव की पूर्णिमा के प्रकाश से अमावस्या की ओर बढ़ते पक्ष में एक पर्व मनाया जाता है जिसे श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। दिन प्रतिदिन घटते चंद्रमा और मंद होते प्रकाश के बीच भारतवर्ष में सभी लोग अपने-अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिये श्राद्धकर्म और अन्य धार्मिक आयोजन करते हैं जिसका एक ही प्रयोजन होता है उनके पूर्वजों की आत्मा की शांति।
कौन होते हैं पितृ? इनका इतिहास क्या है? क्यों इनकी शांति की जानी चाहिए? शास्त्र इनके बारे में क्या कहते हैं? क्या वास्तव में इनका शांंतिकर्म करवाने से इनको शांति मिलती है? अगर इनकी शांति न करवाई जाए तो क्या होगा? क्या पितृ भूत-प्रेत होते हैं? क्या ये अनिष्ट करते हैं या कृपा भी करते हैं? क्या श्राद्ध-तर्पणादि सबकुछ धनिक लोगों को ही करना चाहिए? वर्तमान में श्राद्ध पक्ष का क्या महत्व है? विज्ञान इनके बारे में क्या कहता है? क्या पित्रों ने विज्ञान को भी चमत्कृत किया है? ये सवाल सबके मन में आते हैं, तो आइये जानते हैं पितृदेव के बारे में-
पितृ मानव के पूर्वजों की आत्माएं होती हैं जो मृत्यु के पश्चात पृथ्वी और विभिन्न लोकों में अपने कृत कर्मों का उपभोग करती रहती हैं। पितृ अपने कर्मों के अनुसार विभिन्न योनियों को धारणकर , स्वर्गदि श्रेष्ठ लोकों से लेकर नर्क जैसे नेष्ठ और पृथ्वी जैसे निम्र लोक में भ्रमण करते रहते हैं।
एक कथा के अनुसार एक बार जगतपिता ब्रम्हाजी श्रृष्टि निर्माण के कार्य से थककर विष्णु और महेश आदि के पास सहायता मांगने के लिए जा रहे थे तभी उनको पृथ्वी पर एक कुएं से विचित्र आवाजें सुनाई दीं। उन्होंने अंदर झांककर देखा तो अंधकार में उनको आवाज आई कि हे पुत्र अगर तुम ही अपने कर्तव्य (सृष्टि रचना के कर्म) से विमुख हो जाओगे तो हमें शांति कैसे प्राप्त होगी? अब ब्रम्हदेव ने आश्चर्य से पूछा- आप कौन हैं? कुएं के अंदर से आवाज आई- हम तुम्हारे पितृ हैं। इस कथा से पता चलता है कि सृष्टि रचयिता ब्रम्हदेव के भी पितृ थे जो उनसे पूर्व सृष्टि निर्माण का कार्य कर रहे थे।
भगवान श्रीकृष्ण श्रीगीताजी में कहते हैं कि हे अर्जुन आत्मा अमर, अनाशवान है। इसे अग्रि जला नहीं सकती, पानी गला नहीं सकता, मारुत यानी वायू इसे सुखा नहीं सकती कोई अस्त्र-शस्त्र इसे भेद नहीं सकता।
आत्मा क्या है? आत्मा ऊर्जा का एक रूप है। विज्ञान भी इस बात को मानता है कि ऊर्जा का अंत नहीं हो सकता वो केवल अपना रूप बलकर पुन: सक्रिय हो जाती है। यही ऊर्जा जब मानव शरीर धारण कर इस श्रृष्टि के कर्मबंधन में बंध जाती है तो ये मानव जीवन कहलाता है। इसी जीवन में मोह-ममता के बंधनों से बंधकर आत्मा जब कर्मबंधन से मुक्त नहीं हो पाती तो वो मोक्ष को न पाकर अपने कर्मों के कारण विभिन्न लोकों की योनियों को भोगती रहती है। यही आत्मा पितृ कहलाती है।
लेख धारावाहिक के रूप में निरंतर जारी है। आगे पढ़ें दूसरा भाग।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...
-
एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती दोनों रमण पर निकले। ऋतु आनंद से पूर्ण थी और सृष्टि भी सर्वत्र शांतिमय थी। दोनों प्रसन्न थे। तभी देवी पार्वत...
-
यह कथा विभिन्न धार्मिक कथाओं का आधार लेकर लिखी गई है। हनुमानजी से जुड़ी कथाओं में विभिन्नताओं के चलते विविधता दृष्टिगत होती है। इस कारण कई प...
-
त्रेता युग में काशी क्षेत्र में राजा सौभद्र का शासन था। सौभद्र का भगवान श्रीराम में बड़ा अनुराग था। जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया इ...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें