google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: अनंत भगवान श्रीगणेश

बुधवार, 11 सितंबर 2019

अनंत भगवान श्रीगणेश

भगवान श्री गणेश, माता पार्वती के लाड़ले, शिव के पुत्र, गणों के नायक, देवताओं में प्रथम पूज्य, रिद्धि-सिद्ध के पति, शुभ-लाभ के पिता और दुष्ट असुरों में भय का पर्याय। भगवान श्री गणेश को कितनी ही दिव्य उपाधियां प्रदान की जाएं कम हैं वो अनआदि हैं तो अनंत भी हैं। जिसका न कोई आदि उसका न ही कोई अंत।
भगवान श्री गणेश की लीला मात्र से तीनों लोकों का कल्याण हो जाता है और स्मरण मात्र से भक्त के समस्त दु:ख दूर हो जाते हैं और वो दिव्य आनंद को पाता है। भगवान श्री गणेश के विविध रूपों की विविध लीलाएं हैं। उनका बाल रूप भी दिव्य लीलाओं से भरा हुआ है। आइये जानते हैं उनके बाल्यकाल की एक दिव्य लीला की आनंदमय कथा।
एक बार कैलाश पर भगवान शिव बैठे थे और पास में ही बाल गणेश अपने भाई कार्तिकेय के साथ खेल रहे थे। माता पार्वती किसी कार्यवश बाहर गई हुई थीं। तभी वहां देवराज इंद्र आए। वो भगवान शिव के पास बैठे और स्तुति करके वापस जाने लगे जाते-जाते उन्होंने एक बहुत ही सुंदर और अलौकिक फल भगवान शिवशंकर को समर्पित किया और जाने को प्रशस्त हुए। इतने में वहां सृष्टि रचयिता ब्रम्हदेव आए देवराज उनको प्रणाम करके वहां से चले गए। भगवान शिव तो ठहरे भोले भाले उन्होंने ब्रम्हदेव को वो फल दिखाया और पूछने लगे, ब्रम्हाजी इस फल को किसे दे दूं। उन्होंने सामने खेल रहे गणेश और कार्तिकेय की ओर ब्रम्हाजी का ध्यान आकृष्ट किया। ब्रम्हाजी बोले- ये फल तो कार्तिकेय को ही दो। ये बात पास खेल रहे गणेश ने सुन ली और ब्रम्हाजी के इस पक्षपात पर उनको गुस्सा आ गया पर वो कुछ नहीं बोले।
समय का चक्र गतिशील है। कुछ दिनों बाद भगवान शंकर बाल गणेश को लेकर ब्रम्हलोक पहुंचे। वहां शिवजी से आंखें बचाकर भगवान श्रीगणेश भयंकर और विचित्र मुंह बनाकर ब्रम्हदेव को भयभीत करने लगे। श्रीगणेश का विकट स्वरूप देखकर ब्रम्हदेव भयभीत हो गए। तभी ये सब देखकर भगवान शंकर के सिर पर विराजमान चंद्रमा हंसने लगा उसकी आवाज सुनकर श्रीगणेश ने उसे देखा उसे श्रीगणेश पर हंसता देखकर बालगणेश को क्रोध आ गया उन्होंने चंद्रमा को शाप देते हुए कहा, अकारण मेरा उपहास कर रहा है हे चंद्रमा तुझे अपनी काया का इतना अभिमान है जा ये काया धीरे-धीरे क्षीण हो जाएगी। उसी क्षण से चंद्रमा निस्तेज होने लगा। अब चंद्रमा घबरा गया और श्रीगणेश से विनय करने लगा- प्रभु मुझे क्षमा कर दो। उसका विलाप सुनकर श्री गणेश को दया आ गई और उन्होंने उसे आशीर्वाद देते हुए कहा- चंद्रमा मेरा शाप अटल है पर जिस तरह से तू कृष्ण प्रतिपदा से क्षीण होकर अमावस्या को लुप्त हो जाएगा उसी प्रकार पुन: शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से बढ़कर पूर्णिमा को अपना पुराना रूप पुन: प्राप्त कर लेगा। चंद्रमा प्रसन्न होकर बोला- श्रीगणेश की जय हो श्री गणेश की जय हो।
श्री गणेश की इस लीला से शिक्षा मिलती है कि कभी भी किसी भी चीज का अभिमान नहीं करना चाहिए। जैसे फल आने पर वृक्ष झुक जाते हैं और जल से भरने पर बादल नीचे हो जाते हैं वैसे ही मानव को सदैव विनम्र और सदाचारी बनना चाहिए।

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