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बुधवार, 25 मार्च 2020
कहानी देवी कौशिकी की
एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती दोनों रमण पर निकले। ऋतु आनंद से पूर्ण थी और सृष्टि भी सर्वत्र शांतिमय थी। दोनों प्रसन्न थे। तभी देवी पार्वती को कर्राहने की आवाज आई। देवी पार्वती ने देखा तो भूमि पर एक विशाल पर्वत में से रुदन और क्रंदन करने की आवाज आ रही थी।
देवी पार्वती ने महादेव से पर्वत के कष्ट का कारण पूछा तो महादेव ने बताया कि देवी ये मंदराचल पर्वत है। यह वही पर्वत है जिससे समुद्र मंथन के समय मथनी बनाकर समुद्र को मथा गया था जिससे 18 प्रकार के दिव्य रत्नों की प्राप्ति हुई थी। परंतु यह कष्ट मेें क्यों है स्वामी, देवी पार्वती ने प्रश्न किया। अब महादेव ने बताया कि देवी, मंदराचल का वात्सुकि नाग की रज्जू अर्थात रस्सी बनाकर मंथन किया गया था। वात्सुकि की भयंकर विषमय चमड़ी से रगड़ खाने के कारण मंदराचल के शरीर में वात्सुकि का विष समा गया है। यही विष उसके कष्ट का कारण है। शिव-पार्वती को देखकर मंदराचल ने उनसे उसका कष्ट दूर करने का आग्रह किया। दोनों पृथ्वी पर उतर गये। शिवशंकर ने इस ओर विशेष ध्यान नहीं दिया पर मातृस्वरूपा माता पार्वती ने बारंबार शिवशंकर से अनुनय विनय की कि हे महादेव, मंदराचल के कष्ट का हरण कीजिये।
जब शिवशंकर ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो माता पार्वती ने प्रश्र किया कि हे महादेव, इस पीडि़त पर आपकी दयादृष्टि क्यों नहीं है? इस पर महादेव ने कहा कि हे देवी इसके कष्ट का निवारण करना आपके लिये हानिकारक होगा। पार्वती शिवशंकर की बात समझीं नहीं और कहा कि आप पीडि़त मंदराचल के कष्ट का हरण कीजिये। मुझे कुछ नहीं होगा।
इस पर शिवशंकर ने अपनी शक्ति से मंदराचल के विष को उसके देह से निकाल दिया। मंदराचल कृतार्थ हो गया पर यह विष मंदराचल के देह से निकलकर देवी पार्वती के शरीर में प्रवेश कर गया और देवी पार्वती की गौरवर्णीय देहयष्टि श्यामल वर्ण में परिवर्तित हो गयी। यह देखकर देवी पार्वती दुखित हो गईं और महादेव से उन्हें पूर्ववत करने का आग्रह किया पर महादेव ने माता पार्वती को बताया कि वह ऐसा नहीं कर सकते। उन्हें अब श्यामल वर्ण का होकर रहना होगा। उन्होंने पहले ही सचेत कर दिया था पर माता ने उनकी बात पर ध्यान ही नहीं दिया।
अब शिव वहां से चले गये। देवी पार्वती दुखित होकर अपने पिता हिमालय के पास गईं पर वहां पर भी उनके कष्ट का कोई निवारण नहीं था। अब माता पार्वती हिमालय पर्वत पर बैठकर सृष्टि रचियता ब्रम्हदेव की तपस्या में लीन हो गईं क्योंकि जब शिवशंकर से विवाह के लिये देवी पार्वती तपश्चर्य में लीन होकर तृणकाय होकर तेजविहीन हो गई थीं तब ब्रम्हदेव ने उनके ऊपर अमृत गिराकर उससे स्नान करवाकर उनके देह को पूर्व से भी अधिक तेजोमय और गौरवर्णीय बना दिया था।
जब देवी पार्वती तपस्या में लीन थीं तभी वहां से बहुत दूर दो राक्षस भाई शुम्भ और निशुम्भ भी तपस्या में लीन थे। अब समय के गर्भ में भावी भविष्य जन्म ले रहा था।
माता पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रम्हदेव प्रकट हुए और देवी पार्वती की देह से विष को बाहर निकाल दिया। अब देवी पार्वती पूर्व से भी अधिक तेजोमय और गौरवर्ण की स्वामिनी बन गई थीं। पर समय में अभी और घटनाक्रम शेष था। पार्वती की देह से निकलकर विष एक ओर इकट्ठा हो गया पार्वती कुछ और निश्चित कर पातीं उससे पहले ही एक शिशु रोने की आवाज ने उनका और ब्रम्हदेव का ध्यान आकर्षित किया। पार्वती ने देखा कि विष ने एक बालिका शिशु का रूप ले लिया था और अब वो बालिका रो रही थी। पार्वती अचरज में ही थीं कि ब्रम्हदेव ने बताया कि विष देवी पार्वती के पूर्ववर्ती तेज का कुछ अंश ले गया है जिससे इस बालिका का जन्म हुआ है। देवी पार्वती ये आपका ही अंश है, आपकी ही पुत्री है। बालिका वर्ण श्याम यानी सांवला था पर वो बहुत ही सुंदर थी। मातृस्वरूपा पार्वती ने बालिका को गोद में लेकर स्नेह दिया और उसका नाम रखा गया कौशिकी। दूसरी ओर शुम्भ-निशुम्भ को भी वरदान मिला कि वो केवल एक तरुणी के हाथों से मारे जाएंगे। वो प्रसन्न हो गये कि उसका प्रताप देखकर क्यों कोई तरुणी उनसे युद्ध करने का साहस करेगी।
अब माता पार्वती ने हिमालय पर एक सुंदर महल बनाया और बालिका शिशु कौशिकी का लालन-पालन करने लगीं। माता पार्वती कौशिकी का बहुत ध्यान रखती थी पर उन्हें यह नहीं पता था कि बहुत शीघ्र इस बालिका पर महाभयंकर संकट आने ही वाला था। जिसका सामना करना उनके लिये भी चुनौतीपूर्ण होने वाला था।
शुम्भ और निशुम्भ दैत्यगुरु के पास पहुंचे। शुक्राचार्य ने उनकी सहायता के लिये यज्ञ किया जिसमें से एक वीर योद्धा का जन्म हुआ। इसे नाम दिया गया सुग्रीव और यह इन दोनों का मंत्री बन गया। शुम्भ और निशुम्भ का आतंक बढ़ता गया और वो शीघ्र ही तीनों लोकों के स्वामी बन गये।
अब कौशिकी किशोरावस्था से बढ़कर तरुणी हो गई थीं। वो शिव की परमभक्त थीं। अब कौशिकी को समझदार और योग्य जानकर माता पार्वती कैलाश पर भगवान शिव के पास लौट आईं और कौशिकी को वचन दिया कि वो समय-समय पर उनसे मिलने आया करेंगी। कैलाश पर माता पार्वती ने शिवशंकर को बताया कि कौशिकी आपकी भक्त है और आप उस पर कृपा करें। शिवशंकर ने कहा कि समय आने पर वो कौशिकी के पास अवश्य जायेंगे पर इससे पूर्व माता पार्वती और स्वयं कौशिकी को कठोर परीक्षा का सामना करना होगा। कौशिकी पर भयंकर संकट आने वाला है। देवी पार्वती चिंतित हो गईं।
आकाश मार्ग से भ्रमण करते हुए सुग्रीव ने हिमालय पर देवी कौशिकी का महल देखा तो वो अंदर गया जहां वो कौशिकी से मिला। वो कौशिकी को देखकर कौतुक में पड़ गया।
वो बोला- देवी, आपका यह श्यामल रूप जीवमात्र को तीनों लोकों का आनंद देने वाला है तो देव लोक का क्या कहना? हे, रात्रि के समान सृष्टि को आनंद देने वाली देवी आपका नाम क्या है?
तब कौशिकी ने अपना परिचय दिया। अब सुग्रीव तुरंत शुम्भ-निशुम्भ के पास पहुंचा।
हे, दैत्यों के नायकों मैंने अभी-अभी हिमालय पर एक सुंदर महल देखा और उसकी स्वामिनी देवी कौशिकी के दर्शन किये। वो श्यामली हैं पर उनका रूप सृष्टियों का सुख देने वाला है।
यह सुनकर शुम्भ-निशुम्भ प्रसन्न हो गये। वो बोले- हे सुग्रीव, ऐसी सुंदरी को तो हमारी अर्धांगिनी होना चाहिये। जाओ और सुंदरी से कहो कि हम दोनों से अथवा हम में से किसी एक से विवाह कर ले और तीनों लोकों की निधि का भोग करे। इससे हमें वो दिव्य महल भी प्राप्त हो जायेगा।
अब सुग्रीव पुन: देवी कौशिकी के पास जा पहुंचा और शुम्भ-निशुम्भ का विवाह प्रस्ताव प्रस्तुत किया। देवी कौशिकी ने सुग्रीव से कहा कि वो इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं करेंगी। उन्होंने अपना जीवन शिवभक्ति को समर्पित किया है। सुग्रीव शुम्भ-निशुम्भ के पास पहुंचा और देवी कौशिकी की बात उनको बताई। इस पर वो दोनों क्रोधित हो गये और सुग्रीव से कहा कि वो देवी कौशिकी को कह दे कि वो विवाह करें अन्यथा वो बलपूर्वक उनसे विवाह करेंगे। वो उनका सम्मान रखना चाहते हैं। अगर वो देवी कौशिकी को अधीन कर उनसे विवाह करते हैं तो यह देवी कौशिकी के लिये ही अपमान की बात होगी और वो उन्हें अपमानित नहीं करना चाहते। अगर वो विवाह अस्वीकार करती हैं तो वो उनसे युद्ध करेंगे। इसके बाद बलात उनसे विवाह करेंगे।
सुग्रीव पुन: देवी कौशिकी के पास जा पहुंचा। उसकी बात सुनकर कौशिकी को क्रोध आ गया। वो बोलीं- अब तक मैंने तुम्हारी निर्लज्जता पर तुम्हें दंडित नहीं किया क्योंकि तुम एक दूत का कर्तव्य पूर्ण कर रहे थे। तुम वही कर रहे थे जो तुम्हारे स्वामी ने तुम से कहा परंतु अब चले जाओ और पुन: यहां आने का साहस न करना। अन्यथा भयंकर परिणाम होंगे।
सुग्रीव लौटा और सारा वृतांत शुम्भ-निशुम्भ को कह सुनाया। अब शुम्भ-निशुम्भ क्रोध से भर गये और देवी कौशिकी के विरुद्ध युद्ध की घोषणा कर दी।
विशालदेहधारी राक्षस वीर भयंकर अस्त्र-शस्त्रों से सज्जित होकर देवी कौशिकी महल की ओर चले। ब्रम्हांड में हाहाकर मच गया। माता पार्वती पुत्री कौशिकी पर संकट जानकर व्याकुल हो गईं। वो शिवशंकर से बोलीं- स्वामी, पुत्री कौशिकी की रक्षा कीजिये।
शिवशंकर गंभीर होकर बोले- यह युद्ध एक पुत्री के रक्षार्थ उसकी माता द्वारा लड़ा जायेगा। यह एक माता का युद्ध है जिसकी शक्ति ब्रम्हांडों और सृष्टियों में सबसे प्रबल होती है। यह तुम्हारा युद्ध है पार्वती। अब शिवशंकर ध्यान में चले गये।
अब माता पार्वती कौशिकी के पास पहुंची और उन्हें हिम्मत देते हुए कहा कि तुम्हारा निर्णय सही है। कोई भी स्त्री पर बलात अपनी इच्छा नहीं थोप सकता। भय न करो।
गर्जना करती असुरों की सेना महल के द्वार पर पहुंची ही थी कि सिंह की भीषण दहाड़ को सुनकर असुर घबरा गये। अब असुरों के सामने स्वयं माता सिंहवाहिनी खड़ी थीं। माता सिंहवाहिनी देवी पार्वती के आह्वान पर वहां आई थीं।
उन्होंने राक्षसों से कहा कि वो लौट जायें। अब सेनापति बोला- देवी, हम यहां अपने स्वामी की आज्ञा से आये हैं आप स्वयं देवी कौशिकी का पाणिग्रहण हमारे स्वामियों से अथवा उनमें से किसी एक से करवा दें। इसके पश्चात देवी कौशिकी तीनों लोकों की स्वामिनी होकर आनंद का भोग करें।
देवी दुर्गा ने असुरों से कहा कि वो बलात कौशिकी का विवाह कराने का दुस्साहस न करें और तुरंत वहां से शांतिपूर्व चले जायें। सेनापति ने कहा- देवी, अगर आपने स्वयं विवाह नहीं करवाया तो हम युद्ध में आपको हराकर देवी कौशिकी को अधीन करेंगे इसके पश्चात उनका विवाह होगा। जो आपके और देवी कौशिकी के लिये अपमानजनक होगा। हम आपका अपमान नहीं चाहते। आप स्वयं विवाह की अनुमति दें।
माता पार्वती और देवी कौशिकी यह सब देख रही थीं। माता सिंहवाहिनी को अब क्रोध आ गया- निर्लज्जों मैंनेे तुम्हें एक अवसर दिया था कि अपने और अपने स्वामी के प्राणों की रक्षा करो पर तुमने ऐसा नहीं किया अब तुम्हारा अंत होगा।
राक्षस बोले- देवी, हम आपका सम्मान रखना चाहते थे पर अब युद्ध ही एक अंतिम विकल्प बचा है तो यही सही। वैसे भी एक स्त्री हमारी सेना के सम्मुख है क्या?
देवी बोलीं-अब तुम देखोगे एक माता की शक्ति क्या होती है?
इसके बाद राक्षसों ने भयंकर वाद्ययंत्र बजाने शुरू कर दिये और महाभयंकर युद्ध शुरू हो गया। देवी ने चंडिका का रूप ले लिया और रणभूमि में यहां-वहां रक्त की नदियां बहने लगीं। राक्षसों में भय फैल गया पूरी सेना भाग निकली। पर देवी कौशिकी और माता पार्वती जानती थीं कि राक्षस अब और अधिक तैयारी के साथ आयेंगे। शुम्भ-निशुम्भ इस पराजय से क्रोधित हो गये।
अब कौशिकी से विवाह हमारे सम्मान की बात है- वो दोनों अड़ गये। अब शुम्भ-निशुम्भ ने अन्य राक्षसों को निमंत्रण भेजा और राक्षसों के मान-सम्मान की बात कहकर उनसे युद्ध में अपना योगदान देने की बात कही।
शुम्भ-निशुम्भ के आह्वान पर रक्तबीज नामक असुर उनकी सहायता के लिये पहुंचा। वो युद्ध में जा पहुंचा जहां देवी पार्वती के प्रहार करने पर उसके शरीर से निकली रक्तबूंदों से अनेक रक्तबीज पैदा हो गये। (युद्ध में अलग-अलग दिन माता पार्वती के विविध रूपों का प्रकटन हो रहा था।) रक्तबीज बोला- हे, देवी मुझे वरदान है कि मेरा रक्त जहां-जहां गिरेगा वहां उतने ही रक्तबीज पैदा हो जायेंगे। मुझे हराने की बात छोड़कर अपनी पुत्री का विवाह शुम्भ-निशुम्भ से कर दो। कन्यादान की तैयारी करो और मंगलगीत गाओ। कुछ ही क्षणों में वहां रक्तबीजों की अनंतहीन सेना प्रकट हो गई।
देवी, आप विवश हैं। मेरी बात मानिये। मुझे कोई नहीं मार सकता, रक्तबीजासुर अट्टहास करने लगा। महल के अंदर से देवी कौशिकी यह देखकर चिंतित हो गईं। अब देवी का क्रोध प्रचंड हो गया उनका गौरवर्ण श्यामल हो गया देह विकट हो गया महाभयंकर सिंहराज की दहाड़ गूंज उठी। रक्तबीजासुर चौंक गया। देवी ने एक हाथ में खड्ग उठाया और दूसरे में अग्रि से पूर्ण खप्पर और रक्तबीज के सिर काट कर अग्रि में डालने शुरू कर दिये। असुर सेना में हाहाकार मच गया। देवी कौशिकी माता का यह रूप देखकर चौंक गईं। क्रोधित देवी ने रक्तबीज का संहार कर डाला और क्रोध में विकल होकर चल पड़ी। देवताओं में भय फैल गया। माता का क्रोध सृष्टि में महान असंतुलन पैदा करने लगा। यह देखकर शिवशंकर समाधि से उठे और माता के पथ में जाकर लेट गये। क्रोध से विकल माता ने उन्हें देखा ही नहीं और उनपर पैर रख दिया। शिवशंकर बोले- माता। अपने स्वामी की आवाज सुनकर माता चौककर यथार्थ में आईं और उनके मुंह से उनकी जीभ बाहर आ गई और वह शांत हो गईं। देवी पार्वती का यह रूप माता काली के रूप में प्रसिद्ध हुआ।
शुम्भ-निशुम्भ अब और क्रोधित हो गये। उन्होंने चंड-मुंड को बुलाया वह भी युद्ध में शुम्भ-निशुम्भ की ओर से लडऩे गये पर उनका भी देवी ने संहार कर लिया। इसके बाद सुग्रीव का भी माता ने उद्धार कर दिया। अंतत: शुम्भ-निशुम्भ युद्ध को प्रस्थित हुए। यहां देवी कौशिकी की शिवभक्ति निरंतर जारी थी। माता पार्वती अपनी पुत्री कौशिकी को देखकर सोचतीं कि कब शिवशंकर इनकी भक्ति का इन्हें फल देंगे। शुम्भ-निशुम्भ युद्ध क्षेत्र में जा पहुंचे और चुनौती देने लगे। देवी और शुम्भ-निशुम्भ में भयंकर युद्ध शुरू हो गया पर देवी ने शुम्भ-निशुम्भ का संहार नहीं किया। महल में माता पार्वती यह सब देख रही थीं। कौशिकी अपनी शिवभक्ति में लीन थीं। तभी शिवशंकर वहां प्रकट हुए जिनके दर्शन पाकर देवी कौशिकी धन्य हो गईं अब शिवशंकर ने देवी कौशिकी से कहा कि वह शुम्भ-निशुम्भ के वध के लिये युद्ध में प्रस्थित हों। देवी कौशिकी युद्ध में पहुंचीं जहां उन्होंने शुम्भ-निशुम्भ का वध कर तीनों लोकों को उनके आतंक से मुक्त कर दिया।
यह कथा स्पष्ट करती है कि माता की शक्ति को कभी भी चुनौती नहीं देनी चाहिये और स्त्री को निर्बल जानकर उस पर अपनी मनमर्जी नहीं थोपनी चाहिये। स्त्री का सम्मान करें।
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