google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: कहानी याज्ञवल्क्य की

गुरुवार, 4 जून 2020

कहानी याज्ञवल्क्य की

बहुत पुरानी बात है एक ऋषि थे वैशंपायन, वैशंपायन महर्षि वेद व्यास के शिष्य थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। उनके आश्रम में बहुत से शिष्य अध्ययनरत थे। सभी योग्य थे और ज्ञान में उनका सानी न था पर इन शिष्यों में भी याज्ञवल्क्य के समान कोई योग्य न था।
याज्ञवल्क्य विद्यार्थियों के लिये एक आदर्श के समान थे। ब्रम्ह मुहूर्त में यानी आज के समय में तड़के तीन बजे के करीब उठकर वो नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाते थे। नित्यकर्म यानी शौच जाना और स्नान करना। इसके पश्चात वो गुरु के दर्शन और ज्ञानार्जन के लिये उनके पास जाते थे। इतनी सुबह तो स्वयं वैशंपायन भी उठ न पाते थे।
याज्ञवल्क्य मन और परिश्रम से अध्ययन करते और उसके बाद आश्रम के कामों में भी पूरा-पूरा हाथ बंटाते। साथी मित्रों के प्रति उनका स्वभाव सदैव सहयोगात्मक होता था। उनको जो कुछ भी ज्ञान होता वो दूसरों से अधिक होता था फिर भी वो उसका वृथा (बेकार) प्रदर्शन नहीं करते थे। जो सत्य होता था वो उसका पक्ष लेते थे और असत्य को कभी ग्रहण नहीं करते थे भले ही कितनी ही उच्च कोटी का व्यक्ति उसका समर्थन कर रहा हो। उनके तर्क सशक्त और शास्त्र सम्मत होते थे। वो पाठ्य को प्रायोगिक जीवन में रखकर उसकी उपयोगिता का अनुसंधान भी करते थे। (यानी थ्योरी को यूं नहीं रट लेते थे उसका प्रैक्टिकल उपयोग भी देखते थे।) जब तक विषय समझ में न आ जाता वो उसका मन लगाकर अध्ययन करते। मनस, वाच और कर्म से अध्ययन करते। (यानी विषय को समझकर, बोलकर और फिर उसका उपयोग कर उसे समझते। इसे आजकल के हिसाब से ऐसे समझें पहले पढ़कर समझते थे फिर बोलकर याद करते थे इसके बाद लिखकर मन में बिठा लेते थे।) उनका ध्यान एकाग्र होता था इसलिये उनको कोई भी पाठ सरलता से समझ आ जाता था। आश्रम में आने वाले सभी लोगों और साधुओं की वो सेवा करते थे। स्वर्ग से देवता भी उनकी स्तुति गाते थे कि ऐसा शिष्य तो भाग्य से ही मिलता है वैशंपायन भाग्यवान हैं। धन्य हैं ऐसे माता-पिता जिनकी संतान ऐसी सतोगुणी है।
एक बार वैशंपायन के आश्रम में कुछ साधु आये। वैशंपायन उनके साथ बैठकर चर्चा कर रहे थे और सामने कुछ दूर पर याज्ञवल्क्य अपने कर्म में तल्लीन थे। ये देखकर एक साधु वैशंपायन से बोला- वैशंपायन तुम धन्य हो जो ऐसा सुशिष्य पाया है तुमने। दूसरा बोला- सत्य है, हमारे शिष्य तो एक कार्य में प्रवीण हैं तो दूसरे में अकुशाग्र पर ये तो सभी कार्यों में श्रेष्ठ है। तीसरा वैशंपायन का बचपन का साथी था वो उनको छेड़ते हुए बोला- वैशंपायन, अपने बचपन में तो तुम भी ऐसे कुशाग्र न थे जैसा तुम्हारा शिष्य है यह तो गुरुत्तम है। गुरुत्तम-वैशंपायन का मन क्रोध से भर गया।
अब वैशंपायन अपने ही शिष्य याज्ञवल्क्य से ईर्ष्या करने लगे। बिना किसी कारण के वो उसे डांट देते। कभी दंड भी दे देते। दिन-प्रतिदिन यह बढ़ता ही गया पर याज्ञवल्क्य शांतिपूर्वक अपने अध्ययन में लगे रहे। वैशंपायन की इस धृष्टता से देवता और त्रिदेवों सहित सभी देवियां और स्वयं वैशंपायन के पित्रों का मन व्यथित हो गया। याज्ञवल्क्य जैसे सुशिष्य का अपमान स्वयं परमेश्वर का अपमान है क्योंकि परमेश्वर ही ज्ञान का प्रकाश है। ऐसा पाप करके वैशंपायन अपने लिये अनंत नर्कों के द्वार एक साथ खोल रहे हैं। यह तो वास्तव में महापाप है।
एक दिन वैशंपायन को आश्रम से बाहर जाना पड़ा। वो याज्ञवल्क्य और अन्य शिष्यों को आदेश दे गये कि उनकी अनुपस्थिति में आश्रम का पूरा ध्यान रखा जाये।
वैशंपायन के जाने के बाद उस क्षेत्र के राजा का अनुचर आया और उसने बताया कि राजा का स्वास्थ्य अचानक खराब हो गया है। वैशंपायन चलकर उनका उपचार करें। कार्य में शीघ्रता की जाये। सभी ने विचार किया कि गुरु की अनुपस्थिति में यह कार्य केवल और केवल याज्ञवल्क्य ही कर सकते हैं। अंतत: याज्ञवल्क्य मंत्रसिद्ध जल लेकर राजा का उपचार करनेे चले गये।
राजा को आशा थी कि स्वयं वैशंपायन आयेंगे पर जब उसे पता चला कि उनका शिष्य याज्ञवल्क्य आया है तो उसने निर्दोष याज्ञवल्क्य को काफी समय वृथा बिठाकर रखा फिर उसका अपमान कर उन्हें निकल जाने का आदेश दिया। याज्ञवल्क्य राजा को दंड दे सकते थे पर उन्होंने गुरु का मान रखते हुए वहां से प्रस्थान कर दिया। जब वो लौट रहे थे तो उन्होंने मंत्रसिद्ध जल को घुड़साल की छत पर फेंक दिया ताकि जल पैरों में आकर अपमानित न हो। जल के छत पर गिरते ही वहां दिव्य पुष्पों से लदी लताएं उत्पन्न हो गईं। जिसकी सुगंध यत्र-तत्र फैलने लगी। जब राजा को यह पता चला तो वह स्वयं यह देखने आया। ऐसा चमत्कार तो स्वयं वैशंपायन न कर सकते थे। राजा ने सोचा यह तो उचित नहीं हुआ। सत्ता के मद में चूर राजा ने आदेश दिया- जाओ उस बटुक ब्राम्हण को वापस बुलाकर लाओ।
राजा का अनुचर वापस वैशंपायन के आश्रम पहुंचा और याज्ञवल्क्य को वापस राजा के पास जाने का आदेश सुनाया।
वैशंपायन वापस लौट आये थे। उन्होंने भी याज्ञवल्क्य को वापस जाने के लिये कहा पर स्वाभिमानी याज्ञवल्क्य ने राजा के पास वापस जाने से मना कर दिया और कहा कि उपचार के लिये राजा को स्वयं आना चाहिये। उन्होंने कहा कि राजा ने उनका अपमान किया है जो अनुचित था। राजा को क्षमाप्रार्थी होकर आश्रम आना चाहिये क्योंकि ये याज्ञवल्क्य का ही नहीं बल्कि आश्रम और स्वयं वैशंपायन का अपमान है पर वैशंपायन को यह बात अनुचित लगी। उन्होंने याज्ञवल्क्य को बाध्य करते हुए कहा कि आश्रम का धन राजा की ओर से आता है वो अगर नहीं गये तो राजा को क्रोध आ जायेगा और आश्रम को आर्थिक हानि होगी।
याज्ञवल्क्य ने कहा कि गुरुदेव, हम जो धन पाते हैं वो ज्ञान का प्रकाश फैलाने के लिये पाते हैं यह राजा का अनुग्रह नहीं है। हम उनकी अनुचित प्रभुताई से बाध्य क्यों हों? अपमान का परिहार क्षमा है, दंभ नहीं हम राजहठ से पराजित क्यो हों? उसे दंभ न दिखाकर क्षमाप्रार्थी होकर यहां आना चाहिये।
वैशंपायन को लगा कि याज्ञवल्क्य की बात है तो सही पर यही अवसर है इसके ज्ञान का दंभ (जो कि वैशंपायन के मन का भ्रम से उत्पन्न दोष था) तोडऩे का। ईष्र्या तो पहले से ही उनके मन में थी पर जब याज्ञवल्क्य का स्वाभिमान अखंड रहा तो उन्होंने निर्दोष याज्ञवल्क्य को शाप दिया कि उन्होंने उसे जो ज्ञान अबतक दिया है वो उसे विस्मृत कर देंगे यानी भूल जायेंगे।
अब तक जो ज्ञान याज्ञवल्क्य ने परिश्रम कर अर्जित किया था वह उसे भूल गये। दुखित याज्ञवल्क्य को कष्ट तो हुआ पर उन्होंने साहस का त्याग नहीं किया। वो जानते थे कि ज्ञान वेदों से निकला है और वेदों की माता गायत्री हैं। इसलिये याज्ञवल्क्य ने देवी गायत्री की घोर तपस्या प्रारंभ कर दी। इस तपस्या को देखकर सभी नतमस्तक हो गये। अंत में देवी गायत्री याज्ञवल्क्य के सम्मुख प्रकट हुईं और आशीर्वाद दिया कि उनको वेदों का समस्त ज्ञान प्राप्त होगा और साथ ही उनकी तपस्या के कारण उनको गायत्री के चौबीस ऋषियों में स्थान प्राप्त होगा।
इस प्रकार याज्ञवल्क्य ने अपनी निरंतर साधना से ज्ञान के प्रकाश को प्राप्त किया साथ ही ऐसा महान स्थान प्राप्त किया जो कि किसी के लिये भी असंभव नहीं तो दुर्लभ है। इसके पश्चात याज्ञवल्क्य ने वेदों को समझने के लिये उपनिषद, संहिता और कई ग्रंथों की रचना की।
आज के विद्यार्थियों को याज्ञवल्क्य से शिक्षा लेना चाहिये। शिक्षा को प्राप्त करना भी एक तपस्या है और यह तपस्या तभी सार्थक है जब हम पूर्णता प्राप्त करें। केवल पुस्तकों के ज्ञान को पूर्ण नहीं माना जा सकता जब तक कि वो प्रायोगिक तौर पर कार्यान्वयन के योग्य न हो। विद्या वही है जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर जीवन को ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर दे।

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