हिरण्याकश्यप के वध के बाद जब भगवान नृसिंह का क्रोध शांत नहीं हुआ तो देवताओं ने उनके परमभक्त प्रहलाद को उनके सामने खड़ा कर दिया। प्रहलाद को देखकर क्रोध से विकल नृसिंह चैतन्य हुए। उन्होंने प्रहलाद से संवाद किया।

प्रहलाद को नीति और भक्ति का ज्ञान देकर नृसिंह वहां से चले आए। अब समय था उनके पुन: प्रभू में विलीन होने का परंतु उनका क्रोध अब तक शांत नहीं हो पाया था और यही क्रोध उनके विलीन होने में बाधक था। नृसिंह के क्रोध की ज्वालाओं से ब्रम्हांड तप्तमय होने लगा। प्रकृति में ग्रीष्म तत्व (गर्मी) बढऩे लगा। जीव-जंतु विकल हो गये। पदप(पेड़), लताएं और नदी सरोवर जलने लगे। सृष्टि का संतुलन बिगडऩे लगा। ऐसे में सभी देवताओं ने सोचा कि भगवान नृसिंह को समझाया जाए कि वो क्रोध का त्याग कर पुन: परम तत्व में विलीन हो जाएं पर जो भी ऐसा करने जाता नृसिंह उसे देखकर क्रोधित हो जाते और उसे वहां से प्राण बचाकर भागना पड़ता। अंतत: सभी देव महादेव भगवान शंकर के पास पहुंचे। भगवान शंकर ने परम गण वीरभद्र को नृसिंह को समझाने के लिए भेजा। वीरभद्र वहां पहुंचे। उन्होंने जब नृसिंह को समझाने का प्रयास किया तो क्रोधित नृसिंह उनको आघात करने के लिए दौड़े। वहां कैलाश पर बैठे भगवान शंकर यह सब देख रहे थे।
अब भगवान शिव को क्रोध भी जाग उठा। महाभयंकर पक्षीराज का रूप लिया। इस रूप के चार पैर और दो हाथ थे। यह पक्षी रूप उड़कर नृङ्क्षसह के सामने पहुंचा इस रूप को देखकर नृसिंह आक्रमक होते उससे पहले ही इस पक्षी रूप ने नृसिंह को गिरा दिया और अपने चारों पैरों से क्रमश: उनके दोनों हाथ और दोनों पैर दबा दिये और सामने के हाथों से उनके शरीर को चीर दिया। आघात होते ही नृसिंह वर्तमान में आये और उनका क्रोध दूर हो गया। इसके पश्चात भक्तवत्सल भगवान शिव के पक्षीराज रूप ने उन्हें छोड़ दिया और वो पुन: परमेश्वर में लीन हो गये।
भगवान शिव के इस महाभयंकर पक्षीराज रूप को शरभेश्वर अथवा सरभेश्वर के नाम से जाना जाता है। यह अवतार आकाश भैरव के नाम से भी प्रसिद्ध है। ऐसा कहा जाता है कि इनकी साधना बहुत उग्र होती है इस कारण इनका पूजन न तो नृसिंह न ही भगवान विष्णु के सम्मुख किया जाता है और न ही नृसिंह अथवा विष्णु का पूजन इनके सम्मुख किया जाता है। अगर कोई नादान ऐसा कर दे तो उसका प्रत्यक्ष भयंकर परिणाम होता है।
यूं तो यह भगवान शिव का भयंकर रूप है जो शत्रुओं का नाश करता है पर वहीं भगवान शिव के इस रूप की कथा सुनने से मानव मात्र अपने नैसर्गिक शत्रुओं यथा काम, क्रोध, लोभ, मोह, मात्स्र्य सहित अन्य मनोव्याधियों पर विजय पाता है। अंतत: शिव की कथा शिव को समर्पित।
शिवार्पणमस्तु।
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