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सोमवार, 19 जनवरी 2026

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है।
माय मास्टर्स वाइज, दिल कुत्ते की तरह भागकर वहां जाता है। आवाज सुनता है, उनको नहीं पाता, सुस्त होकर बैठ जाता है।
मास्टर, जिंदगी को बनाने वाला, आकार देने वाला, रास्ता दिखाने वाला, फिक्रमंद। आंखों से सब कहने वाला कि बोलने की जरूरत ही क्या?
हम देख ही नहीं पाते, हमारे पीछे वो हमेशा हैं। आगे तो हम हैं न....वर्ना तो वो आगे चलकर सारी परेशानी खुद ही झेल लेते। शब्दों से परे उनको बयां करना...क्योंकि शब्द समझे जा सकते हैं, भावों को भी समाहित कर लेते हैं पर वो इतनी ऊंचाई पर हैं कि बस उनको देख सकते हैं। उनको लफ्जों के सांचे में कैसे ढालें?
जो पास है....उस तक नजर नहीं करते, उसका प्यार मन की उलझनों में बाहर ही रोका जाता है। वर्ना वो तो दिल का सुकून है। उसकी पनाह में जाकर बस, खुशी है....बयान के परे। रब, दिली उलझनों से बाहर लाए ताकि उस पनाह में चंद पल चैन से सो जाएं। लिपट जाए। अपने दिल के रिकार्ड को उनके लिए बजाएं क्योंकि उनको भी अल्फाजों में ढाला नहीं जा सकेगा। हम अल्फाजों में खुद को ढाल ले, अपनी गफलतों को बयां कर दें, पर रुहानी सुकूं को नहीं...कभी नहीं....।

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