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बुधवार, 3 फ़रवरी 2021
हनुमान-बाली का महायुद्ध
यह कथा सुनी-सुनाई प्रचलित लोककथाओं पर आधारित है।
एक बार हनुमान पिता केशरी और माता अंजनी से मिलकर आकाश मार्ग से जा रहे थे तभी उन्हें देवर्षी नारद मिल गये। देवर्षी नारद ने आशीर्वाद देने के बाद हनुमान से देवी अंजनी और केशरी का कुशलमंगल पूछा। इसके पश्चात सुग्रीव के बारे में चर्चा की। वार्ता करते हुए नारद जी ने हनुमान से कहा कि वे वचन दें कि यदि कभी हनुमान का बाली से सामना हो जाये तो वो उसका वध नहीं करेंगे। क्योंकि सुग्रीव का पक्ष लेने के कारण हनुमान से बाली शत्रुता रखता था। और संभव था कि जब वे मिलेंगे तो बाली उन पर प्रहार करने से नहीं चूकेगा। वैसे भी बाली को पिता इंद्र का वरदान था कि शत्रु की आधी शक्ति उसमें आ जायेगी। इस वरदान के बल पर वो महाबली दशग्रीव रावण को युद्ध में हरा चुका था जिससे उसका उत्साह भी प्रबल था।
हनुमान ने नारद जी से कहा कि उनकी बाली से शत्रुता है ही नहीं। अपने गुरु सूर्यदेव को दी गुरुदीक्षा के वचन के कारण वो सुग्रीव के साथ हैं। वो कभी बाली का वध तो क्या उस पर प्रहार भी नहीं करेंगे। पर नारद ये सब क्यों कह रहे हैं? क्या भविष्य के गर्भ में को दुर्घटना छुपी हुई है? नारद हंसे- नारायण..नारायण, मेरा काम तो जगत कल्याण करना और सचेत करना है। कहीं कोई दुर्घटना न हो जाये बस यही बात है। वैसे भी बाली का वध हनुमान के हाथों होना विधि का विधान नहीं है।
हनुमान ने नारद जी को आश्वस्त किया और चले गये। पर उन्हें यह नहीं पता था कि बहुत शीघ्र अनर्थ होने ही वाला था।
हनुमान के पिता केशरी देवी अंजना के साथ नित्य ही भ्रमण पर निकला करते थे। एक दिन वो देवी अंजना के साथ वनभ्रमण कर रहे थे तभी वहां बाली आ गया। वो अपने क्षेत्र का निरीक्षण कर रहा था। केशरी को देखकर वो क्रोधित हो गया और समझ गया कि हनुमान सुग्रीव के पास हैं और यही उचित समय है जब केशरी पर प्रहार कर हनुमान को सुग्रीव का समर्थन करने का दंड दिया जा सकता है। उसने केशरी को युद्ध के लिये आमंत्रित किया। केशरी वृद्ध थे और बाली के हाथों वीरगति को प्राप्त करते इस बात को अंजना समझ गईं और इससे पूर्व कि बाली प्रहार करता उन्होंने अपने पुत्र हनुमान का स्मरण किया- पुत्र हनुमान..शीघ्र आओ। शीघ्र आओ हनुमान लला।
सुग्रीव के पास खड़े हनुमान को देवी अंजना की आवाज सुनाई दी। हनुमान त्वरित अंतर्धान हो। मन के वेग से चल पड़े। बाली गदा उठाकर आगे बढ़ा ही था कि उसके सामने गर्जना करते हुए हनुमान आ खड़े हुए।
बाली..मेरे वृद्धकाय पिता पर क्या प्रहार करता है? क्षमता है तो मुझसे लड़। मेरे न होने का अनुचित लाभ उठाने का परिणाम अब तू भुगतेगा। -हनुमान गर्जे।
बाली बोला- तेरी आधी शक्ति मुझ में आ ही गई है हनुमान। मुझे तेरा भय नहीं। अच्छा हुआ तू खुद ही आ गया। अब मैं तुझे सुग्रीव का पक्षधर होने का दंड दूंगा।
हनुमान बोले- तेरा गर्व और शिर दोनों आज खंड-खंड हो जायेंगे।
दोनों में भीषण युद्ध शुरू हो गया। हनुमान रूद्र थे और रूद्र की शक्ति का पार नहीं है। बाली ने रूद्र के क्रोध को जगा दिया था। हनुमान ने बाली का चित कर दिया और उसके हाथ उखाड़कर उसका वध करने को प्रवृत्त होने लगे। तभी नारद जी की मधुर आवाज गूंज उठी- नारायण..नारायण..नारायण। हनुमान को अपना वचन याद आ गया और उन्होंने बाली को छोड़ दिया। बाली दुवर्चन कहता हुआ वहां से चला गया। हनुमान ने केशरी और माता अंजनी को हुए कष्ट की क्षमा मांगी और उन्हें निवास तक छोड़कर पुन ऋष्यमूक पर्वत की ओर चले गये।
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