google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: क्रोध सर्वदा तज्येत

रविवार, 10 मई 2020

क्रोध सर्वदा तज्येत

एक बार भगवान श्रीकृष्ण, बलराम और सात्यिकी तीनों घूमने निकले। चलते-चलते तीनों बहुत दूर आ गये। शाम होने लगी नगर बहुत दूर था इसलिये तीनों ने विचार किया कि रात को यहीं जंगल में किसी सुरक्षित स्थान पर रात्रि विश्राम किया जाये। सुबह नगर को लौट जायेंगे।
तीनों एक विशाल वृक्ष के नीचे पहुंचे।
यह स्थान उत्तम है क्यों कन्हैया- बलदाऊ ने पूछा।
हां, बलदाऊ ये सर्वोत्तम स्थान है, आपका क्या मत है सात्यिकी- श्रीकृष्ण ने सात्यिकी ने पूछा।
बिलकुल, यह स्थान सभी दृष्टियों से उचित है।- सात्यिकी ने दोनों का समर्थन किया।
अब स्थान चयन हो गया तो तीनों ने निश्चित किया कि सुरक्षा की दृष्टि से तीनों रात्रि में तीन पहर बारी-बारी से जागकर पहरा देंगे।
सबसे पहले बारी थी बलराम की। श्रीकृष्ण और सात्यिकी सो गये। रात्रि का भयभीत कर देने वाला समय था। जीव-जन्तुओं की भयंकर आवाजें सिहरन पैदा कर रही थी। कुछ समय पश्चात पेड़ से भूत नीचे आया और बलराम से बोला- हे महाकाय, अगर तुम मुझे इन दोनों (श्रीकृष्ण और सात्यिकी) को खा लेने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
भूत की बात सुनकर बलराम को क्रोध आ गया। रुक जा भूत तुझे अभी प्राणदंड देता हूं-ऐसा कहकर बलराम ने भूत को युद्ध की चुनौती दी जो उसने स्वीकार कर ली।
दोनों में खूब घमासान युद्ध हुआ। कुछ ही देर में भूत बलराम पर भारी पडऩे लगा। जैसे-जैसे बलराम का क्रोध बढ़ता जाता वैसे-वैसे ही भूत का आकार बढ़ता ही जाता। अब भूत ने बलराम को खूब मारा-पीटा और उठाकर पटक दिया। दूसरे के जागने की बात जानकर भूत वापस पेड़ पर चढ़ गया।
धूलधूसरित बलराम उठे। अब सात्यिकी के जागने की बारी थी वो जागे। उन्होंने बलराम को घायल देखा और पूछा- ये क्या हुआ बलदाऊ? भूत से अपनी पराजय और पिटाई से लज्जातुर बलराम बिना कुछ बोले सो गये। अब सात्यिकी जागने लगे भूत फिर से नीचे आया।
तुम कौन हो?-सात्यिकी ने पूछा।
मैं भूत हूं और इस पेड़ पर मेरा निवास है। - भूत ने उत्तर दिया।
तुम मुझसे क्या अपेक्षा करते हो?- सात्यिकी ने दूसरा प्रश्र पूछा।
महाबाहू, अगर तुम इन दोनों (बलराम और श्रीकृष्ण) को मुझे खाने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
भूत की बात सुन सात्यिकी को क्रोध आ गया।
दुष्ट, रुक जा मैं तुझे अभी उचित दंड देता हूं- सात्यिकी ने कहा।
सात्यिकी और भूत में भयंकर युद्ध शुरू हो गया। अब फिर वही हुआ। जैसे-जैसे सात्यिकी का क्रोध बढ़ता जाता वैसे-वैसे ही भूत का आकार बढ़ता ही जाता। भूत ने सात्यिकी को खूब मारा-पीटा और उठाकर पटक दिया। तीसरा पहर शुरू होने वाला था। अब श्रीकृष्ण के जागने की बारी थी। यह समझ भूत वापस पेड़ पर चढ़ गया।
अब तीसरे पहर श्रीकृष्ण उठे। सात्यिकी को घायल देखकर श्रीकृष्ण अधरों पर मंद मुस्कान लिये पूछने लगे- अरे मित्र सात्यिकी ये क्या हुआ?
सात्यिकी भला अपनी बुरी तरह हुई पिटाई की बात भगवान श्रीकृष्ण को कैसे बताते? उन्हें लज्जा का अनुभव हुआ वह भी बिना कुछ कहे सो गये।
अब भगवान श्रीकृष्ण पहरे पर बैठे। भूत फिर नीचे आया।
अरे तुम कौन?- श्रीकृष्ण मुस्कुराये।
मैं भूत हूं, इस पेड़ पर रहता हूं। अगर तुम मुझे इन दोनों (बलराम और सात्यिकी) को खाने देते हो तो मैं तुमको सकुशल जाने दूंगा।
मन ही मन सबकुछ समझ श्रीकृष्ण मुस्काये।
अरे..रे..रे..मित्र भूत, तुम तो बड़े दुस्साहसी निकले। मेरे सामनेे ही इस प्रकार बात करते हो। तुम्हें मेरी प्रतिक्रिया का भय भी नहीं लगता। - श्रीकृष्ण मुस्काये।
चुप रहो..पीताम्बरधारी, मेरी बात मान लो अन्यथा मुझसे युद्ध करो। भय किस बात का भय तुम्हारे इन दोनों वीरों की दुर्गति मैंने ही बनाई है। अगर मेरी बात न मानी तो तुम्हारी भी यही गति करूंगा।- भूत ने श्रीकृष्ण को डराया। अरे..बहुबली तुम तो बड़े वीर लगते हो पर बड़े मूर्ख हो, वीर कभी बातें नहीं करते वो तो युद्ध करते हैं युद्ध।- श्रीकृष्ण फिर मुस्काये।
श्रीकृष्ण की बात और बार-बार उनके अधरों की मुस्कान देखकर भूत का क्रोध आ गया।
मुझे, मेरे ही क्षेत्र में मूर्ख कहते हो। मैं तुम्हें छोडूंगा नहीं- भूत ने चुनौती दी।
अब श्रीकृष्ण में और भूत में भयंकर युद्ध छिड़ गया। श्रीकृष्ण बोले- हे भूत तुम तो महाशक्तिशाली हो। तुम्हारी इस शक्ति का रहस्य क्या है?
जैसे-जैसे भूत का क्रोध बढ़ता गया वैसे-वैसे उसका आकार छोटा होता गया अंत में वो एक कीड़े के आकार का रह गया तब श्रीकृष्ण ने उसे अपने पीताम्बर में बांध लिया और प्रात: काल की प्रतीक्षा करने लगे।
सुबह बलराम और सात्यिकी की नींद खुली वो जागे। श्रीकृष्ण को देखकर वो मौन रहे।
श्रीकृष्ण ने उनसे पूछा- दाऊ भैया और मित्र सात्यिकी आपके शरीर पर यह घाव कैसे?
दोनों मौन रहे। कहीं आपके मौन का कारण यह भूत तो नहीं? श्रीकृष्ण ने अपने पीताम्बर से भूत को बाहर निकाला।
हां, कन्हैया- बालराम बोले।
अब श्रीकृष्ण बोले- आपके समान ही यह भूत मेरे पास भी आया था। मेरे और इसके मध्य भी वैसा ही युद्ध हुआ जैसा आप लोगों के साथ इस भूत का हुआ था।
पर मधुसूदन आपने इसे कैसे बांध लिया? जब यह हमसे युद्ध कर रहा था तो इसका आकार बढ़ता जाता था पर आपके सामने तो यह कीड़े की भांति हो गया- सात्यिकी के प्रश्र पर बलदाऊ ने भी सहमति जताई।
मेरे प्रियों, जब यह आपसे युद्ध करता था तो यह आपको क्रोध दिलवाता था जिससे आपकी शक्ति क्षीण हो जाती थी वहीं इस भूत की शक्ति और आकार बढ़ जाता था। मैनें इस भूत को क्रोध दिलवाकर इसकी शक्ति को क्षीण कर दिया। जिससे इसका आकार घटता गया और घटकर कीड़े की भांति हो गया। प्रिय जनों क्रोध मानव की चेतन का हरण कर लेता है जिससे उसकी बुद्धि अस्थिर हो जाती है जिससे उसको उसकी शक्ति और उसके उपयोग को लेकर ज्ञान नहीं रहता और वह बलवान होने के स्थान पर शक्तिहीन हो जाता है। इसलिये क्रोध कभी भी नहीं करना चाहिये। मन को हर स्थिति में स्थिर रखना चाहिये और जो क्रोध कर ऐसा करते हैं उनका परिणाम इस भूत की भांति होता है- ऐसा कहकर भगवान श्रीकृष्ण ने पीताम्बर से निकाल कर भूत को भूमि पर गिराया और उसे पैरों से कुचल दिया।
इस कथा से शिक्षा मिलती है कि क्रोध नहीं करना चाहिये और मन को सर्वदा स्थिर रखकर इसके आवेग से मुक्त रखना चाहिये। जिस पर प्रकार अतिबलशाली विक्षिप्त गजराज एक छोटे से अंकुश बाध्य हो जाता है उसी प्रकार बलशाली पर क्रोध से युक्त मानव भी पराजित हो जाता है।

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