google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: दीपावली की पांच कहानियां: प्रथम धनतेरस

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

दीपावली की पांच कहानियां: प्रथम धनतेरस

दीपावली त्यौहार है पांच दिवसों का और इसके पांच दिवसों में छिपी हुई हैं पांच कहानियां हर दिन की एक कहानी और इस कहानी से जुड़ा एक संदेश। ये कहानियां जहां रोचक हैं वहीं गूढार्थ में इसमें छिपा हुआ है प्रकाश का सार। चलिए जानते हैं हर दिन की एक कहानी।
कश्यप ऋषि की दो पत्नियां थीं दिती और अदिती जिनसे दिती से देवताओं का जन्म हुआ और अदिती से असुरों का जन्म हुआ। देवता अपनी विलक्षण प्रतिभा के चलते स्वर्ग के अधिपति बन गए वहीं असुरों का धरती पर रहकर जीवन व्यापन करना पड़ा। देवगुरु बृहस्पति को सम्मान और स्वयं को उचित स्थान न मिलने से दुखी भृगु पुत्र शुक्राचार्य भी असुरों के पास आ गए और असुरों ने उनको अपना गुरु बना लिया। देवताओं को सुखी जीवन जीता और स्वयं का पराभव देखकर असुर दुखी हो गए और दैत्य राजा बलि के अधीन एकत्र हो गए। बलि एक कुशल राजा और एक वीर योद्धा थे। उसका सेनापति दैत्यराज राहू था। उन्होंने सभी के सामने अपनी बात रखते हुए असुरों को भी देवताओं के बराबर का अधिकार देने और उन्हें अमूल्य रत्न देने का अनुरोध किया। अब इस बात पर देवताओं ने एक विशालसभा का आयोजन किया जिसमें देवताओं और असुरों के साथ बृहस्पति, शुक्राचार्य, नवग्रह और सभी शक्तियां सम्मिलित हुईं।
काफी चर्चा और विवाद के बाद यह निष्कर्ष निकाला गया कि समुद्र का मंथन किया जाए और जो भी रत्न मिलें उनको असुरों और देवताओ ं में बराबर बांट दिया जाए। इस बात पर सभी सहमत हो गए। असुरों को शुक्राचार्य ने बताया कि समुद्र में बहुत से रत्न हैं सभी अमूल्य हैं पर सबसे अमूल्य है अमृत नाम का रत्न अ_ारह रत्नों में सबसे अंतिम और सबसे मूल्यवान है जिसको पीने के बाद अमरत्व प्राप्त हो जाता है। अब असुरों को केवल और केवल अमृत ही दिखाई देने लगा।
निश्चित दिन मंदराचल पर्वत की मथनी और वात्सुकि नाग की रस्सी बनाकर समुद्र मंथन शुरू हुआ। धुरी का आधार विष्णु के कच्छप अवतार ने लिया और मंदराचल पर भार देने के लिए ब्रम्हा उस पर विद्यमान हुए। असुरों को पता चला कि अमृत तो वात्सुकि के मुंह की तरह से निकलेगा। वो इस बात पर चर्चा करने लगे पर मुख की ओर से देवताओं ने पकड़ा और पूंछ की ओर से असुरों ने और शुरू हो गया समुद्र मंथन पर जैसे ही वात्सुकि के देह पर दबाव पड़ा उसके मुख से विष और अग्रि निकलने लगी अब तो देवता वहां से भागे। मंथन रुक गया अब निर्णय हुआ कि मुख की ओर से असुर और पूंछ की ओर से देवता वात्सुकि को पकड़ेंगे। मंथन फिर शुरू हुआ। पर अब भी जब-तब विष और अग्रि निकलती तो असुर भागने लगते पर राहू और बलि सहित कुछ असुर मंथन में सहभागी रहे। मंथन में से ऐरावत नामक हाथी निकला जिसमें असुरों की रुचि नहीं थी वो इंद्र ले गए। उच्चेश्रवा नामक घोड़ा भी इंद्र को ही मिल गया। अप्सराएं प्रकट हुई वो भी देवताओं के साथ स्वर्ग चली गईं। कुछ समय बाद एक कुंभ प्रकट हुआ जिसमें मदिरा थी तो राक्षसों ने दौड़कर उसे ले लिया देवता शंकित दृष्टि से देखते रहे और असुर उसे पी गये। भ्रम टूटने पर असुर दुखित भी हुए। वैसे भी देवता उसे ग्रहण करते भी नहीं। देवता अमृत को लेकर आश्वस्त भी थे कि भगवान विष्णु उन्हें वो दिलवा ही देंगे इसलिये वो तनावमुक्त भी थे। वहीं असुर तनाव में थे। अब हलाहल विष निकला जिसे विश्व के रक्षार्थ शिवशंकर पी गये और कंठ में धारण कर लिया।
लक्ष्मी के निकलते ही असुर उनकी ओर दौड़े पर ये जानकर कि वो धन्वतरी नहीं हैं वो निराश हुए और पुन: अपने काम में लग गये।
कहते हैं अंत में धन्वंतरी निकले जिनको ज्ञात वर्णन के अनुसार देवता पहचाते थे। इसलिये वो धन्वंतरी की ओर दौड़े और उनको लेकर भाग निकले। कई बार अपने भ्रम से निराश असुर इसको भी एक छलावा समझे और जब तक वो सत्य समझते तब तक देवता धन्वंतरी को लेकर जा चुके थे। अंत में असुरों ने धन्वंतरी को देवताओं के साथ एक जगह रोक लिया और अमृत पान को लेकर विवाद होने लगा। इस पर भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप लिया और अमृत देवताओं को पिला दिया। इसी समय असुर सेनापति दैत्यराज राहू ने इसके बारे में असुर पति बलि को बताया पर मोहिनी के वशीकरण पाश में बंधे बलि ने उन पर ध्यान नहीं दिया जिस पर वो स्वयं देवता बनकर अमृत पान कर गये और भगवान विष्णु सुदर्शन से राहू और केतु के रूप में विख्यात हुए।
इसके पश्चात राजा बलि को क्रोध आ गया और उन्होंने प्रण किया कि अब शांति धारण से कोई लाभ नहीं है अपने अधिकार की प्राप्ति के लिए अब देवताओं से युद्ध ही एकमात्र विकल्प रह गया है। इसके साथ ही वो शुक्राचार्य के मार्गदर्शन में एक महायज्ञ का आयोजन करने हेतु प्रवृत्त हुए।
ईश्वर ने सभी को सद्बुद्धि नामक अमृत दिया है इसकी सहायता से आप अमावसी दुख के काल में भी दीपावली जैसा आनंदमहोत्सव मना सकते हो बस आवश्यकता है उसे पहचानने की। जिस प्रकार भगवान श्री विष्णु ने देवताओं को अमृत पान करवाकर उनको अजरता और अमरता प्रदान की उसी प्रकार प्रभु सभी के कष्टों का निवारण करें।

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