google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: दीपावली की पांच कहानियां: द्वितीय नर्कचौदस

शुक्रवार, 25 अक्टूबर 2019

दीपावली की पांच कहानियां: द्वितीय नर्कचौदस

एक बार देवलोक पर नरकासुर नामक असुर का अधिकार हो गया। नरकासुर ने देवराज इंद्र को ललकारा तो वो अपनी मां को छोड़कर भाग निकले। नरकासुर उनकी माता दिति के पास गया और उनका अपमानकर उनका कंठहार लेकर चला गया। दिति को बड़ा क्रोध आया पर वो कुछ न कर सकीं।
नरकासुर को वरदान था कि वो स्त्री हाथों सदगति को प्राप्त करेगा। नरकासुर आश्वस्त था कि उसका भय और प्रताप इतना है कि कोई स्त्री उसके सम्मुख आ ही नहीं सकती।
स्वर्ग से बहिष्कृत देवता और इंद्र भागकर पृथ्वी पर भगवान श्रीकृष्ण की शरण में पहुंचे। विनती की कि प्रभु अब आप ही हमारी रक्षा कर सकते हो और हमारा खोया सम्मान लौटा सकते हो।
देव माता के अपमान की बात सुनकर श्रीकृष्ण को बड़ा क्रोध आया। उन्होंने इंद्रादि देवताओं को आश्वस्त किया कि वो नरकासुर के आतंक का अंत करेंगे।
भगवान श्रीकृष्ण निश्चित दिन गरुण पर सवार हो गये और सारथी का काम उनकी तीसरी महारानी सत्यभामा को दिया। अब गरुण उड़ चला नरकासुर की नगरी को। कुछ समय में वो नरकासुर की नगरी को जा पहुंचे। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- हे गरुण जरा नरकासुर को हमारे आने का संदेश तो दे दो। जरा हमारी ललकार और प्रताप तो दिखाओ।
गरुण पंखों को फैलाकर जोर-जोर से हिलाकर नगरी पर उडऩे लगा। इससे वहां भीषण हवाएं चलने लगी। नगरवासी भयाक्रांत होकर भागने और चिल्लाने लगे। ये देखकर नरकासुर अपने यान में बैठकर श्रीकृष्ण के सामने आ गया। दोनों में भीषण संग्राम शुरू हो गया। श्रीकृष्ण के युद्धास्त्रों से नरकासुर को घात हो जाता और जब नरकासुर अस्त्र-शस्त्र फेंकता तो सत्यभामा श्रीकृष्ण तक पहुंचने के पहले ही उसे रोककर नष्ट कर देतीं। इससे सत्यभामा के हाथों में घात भी हो गया और रक्त बहने लगा। यह देखकर श्रीकृष्ण को क्रोध आ गया और उन्होंने और अधिक भीषण अस्त्र-शस्त्रों के घात से नरकासुर को व्याकुल कर दिया पर उसकी मृत्यू न हो सकी।
सांध्य जब युद्ध को विराम लगा तो श्रीकृष्ण सत्यभामा को देवमाता के पास छोड़कर एकांत में एक पर्वत पर पहुंचे और भगवान शिव की आराधना की।
कर्पूर गौरम् करुणावतारम्...... भगवान श्रीकृष्ण की आराधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। भगवान श्रीकृष्ण ने देवताओं और पीडि़त मानवों की बात बताकर नरकासुर के उद्धार का मार्ग प्रशस्त करने की बात कही। शिव शंकर बोले- वसुदेव, मेरे वरदान से नरकासुर किसी भी अस्त्र या शस्त्र से नहीं मर सकता पर लोक हितार्थ मैं आपको एक अस्त्र देता हूं। यह सत्यभामा के हाथों से लेकर आप नरकासुर को उद्धार करें। श्रीकृष्ण ने अस्त्र ले लिया। दूसरे दिन फिर से दोनों महारथी आमने सामने हुए और श्रीकृष्ण ने सत्यभामा के हाथों से अस्त्र लेकर नरकासुर का उद्धार कर दिया।
इसके बाद वो दोनों देव लोक पहुंचे जहां देवताओं ने दीप जलाकर और नृत्यगान सहित विविध प्रकारों से श्रीकृष्ण और सत्यभामा को प्रसन्न किया।
नर्क वहीं हैं जहां आप संताप पाते हैं। संताप भी आप तब पाते हैं जब संताप को ही बांटते हैं और संताप को ही सभी ओर दृश्यमान पाते हैं। मन के द्वार को खोलें दूसरों को आनंद बांटे और सभी के आनंद में आनंद मनाकर मन को प्रकाशित करें। इस प्रकार जैसे देवताओं को श्रीकृष्ण की कृपा से आनंद की प्राप्ति हुई उसी प्रकार सभी जनों को आनंद की प्राप्ति हो।

1 टिप्पणी:

  1. हेलो एडमिन सर, आपका ब्लॉग बहुत प्यारा है। मैं आपके ब्लॉग को रोज पढ़ती हूँ।
    मैं रोज आपके ब्लॉग को पढ़ने आती हूँ। आप की मेहनत बहुत ही कारगर है।
    आपकी वेबसाइट का आर्टिकल Deepawali Festival Story 2022 मुझे बहुत पसंद आया।
    आप ऐसे ही तरक्की करें सर, थैंक्स

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