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शनिवार, 19 अक्टूबर 2019
सत्रहवां श्रृंगार
ये कहानी है राजा नल और उनकी पत्नी दमियंती की। दमियंती महान सति और साध्वी थीं। इस कथा से यह पता चलता है कि पति-पत्नी का संबंध जन्म-जन्मांतरों का संबंध होता है और पत्नी अपने संकल्प से पति का कल्याण कर सकती है तथा अपनी तपस्या से विधि के विधान को भी चुनौती दे सकती है।
बहुत समय पहले किसी नगर में राजा नल राज किया करते थे। उनकी पत्नी दमियंती पतिव्रता और साध्वी स्वभाव की थीं वहीं राजा नल द्यूत क्रीड़ा यानी जुएं के शौकीन थे। अपने शौक के चलते राजा को राज्य से हाथ धोना पड़ा और वो वन में दमियंती के साथ वास करने लगे। कुछ समय बात उनकी मृत्यू हो गई और दमियंती ने भी अपने प्राण त्याग दिये।
दमियंती का अगला जन्म हुआ पर उनको अपना अतीत याद रहा योग्य होने पर वो राजा नल को ढूंढने निकली। वो उनको खोज ही रहीं थीं कि उनको कुत्तों के भौंकने और एक श्वान के करुणक्रंदन का स्वर सुनाई दिया वो वहां पहुंची तो देखा कई कुत्ते मिलकर एक कुत्ते को नोच रहे थे। दमियंती ने कुत्तों को भगाकर देखा तो राजा नल कुत्ते के रूप में वहां घायल पड़े थे। दमियंती उनके पास गई और उनको उठाया।
दमियंती को मानव और स्वयं को कुत्ते के रूप में देखकर राजा नल दुखित हुए।
दमियंती तुम सद्कर्मों के चलते मानवीय रूप में रही पर मैं अपने कुकर्मों के चलते देखो श्वान के रूप में दुख भोग रहा हूं।
स्वामी सब ठीक हो जाएगा। दमियंती ने समझाया।
पर नल जानते थे कि अब सबकुछ ठीक नहीं हो सकता। देवी, तुम तो रूप यौवन से संपन्न हो जाओ और विवाह कर अपने जीवन को सुख से जियो। क्यों मुझ श्वान के साथ अपना जीवन नर्क बना रही हो देखो लोग देख रहे हैं।
स्वामी अग्रि के समक्ष मैंने आपको जन्म-जन्मांतरों के लिए अपना पति माना है मैं आपको कष्ट में छोड़कर नहीं जा सकती।
दमियंती ने श्वान रूप राजा नल की सेवा शुरू कर दी। लोग क्या कहते हैं उनको उसकी तनिक भी चिंता न थी। वो नल का सामीप्य प्राप्त कर प्रसन्न थीं। पर ये साथ अधिक दिन नहीं रहा और श्वान रूप राजा नल की मृत्यु हो गई। दुखित दमियंती ने भी प्राण त्याग दिये।
अब दमियंती का नया जन्म एक राजकुमारी के रूप में हुआ यहां भी उनको अपना अतीत याद रहा और वो राजा नल को खोजने लगीं। एक दिन उन्होंने वन में एक घायल पड़े मृग को कर्राहते हुए पाया। ये राजा नल ही थे।
राजा नल दमियंती को देखकर पुन: दुखी हुए।
क्यों मुझ पातकी के चक्र में पड़कर जीवन को नष्ट कर रही हो देवी।
पर धर्म पथ पर अड़ी दमियंती ने फिर वही बात कही- स्वामी मैंने आपके साथ अग्रि के समक्ष सात फेरे लेकर आपको अपना सर्वस्व माना है मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी। अब पुन: दमियंती को स्वामी का मृग का रूप में सानिध्य मिल गया अब दोनों आनंद पूर्वक उपवन में खेलते और प्रसन्न होते। पर काल पर किसका वश चलता है एक दिन दमियंती ने मृग को भी मृत पाया अब वो उदास रहने लगीं। वो उपवन में प्रहरों तक व्यथित बैठी रहतीं। एक दिन जब वो व्यथित बैठी थीं तभी वहां एक मोर आ गया। वो यहां-वहां मतवाली चाल में चलकर मधुर कूजन करने लगा। दमियंती ने जब मोर को देखा तो पहचान लिया ये राजा नल ही थे। दमियंती का खोया आनंद लौट आया वो अब एक पल को भी मयूर को नहीं छोड़तीं। मयूर रूपी राजा नल भी दमियंती के साथ आनंद को पाते। कभी-कभी तो वो उड़कर महल में भी आ जाते पर वो अब भी दमियंती से यही कहते- दमियंती मोह का त्याग कर दो, मुझ पापी को कभी मानव का जन्म न मिलेगा। तुम क्यों जीवन व्यर्थ गवां रही हो। पर दमियंती का उत्तर वही होता- स्वामी पति-पत्नि का संग तो कभी न टूटने वाला धागा है। स्वामी निराश न होइये। सबकुछ ठीक हो जाएगा।
समय का फेर तो जैसे दमियंती के विरोध में ही था। एक दिन मयूर देहधारी राजा नल न आये, कभी-कभी वो विलंब से आते थे इसलिये दमियंती ने प्रतीक्षा की, पर मयूर न आया तो वो उसे ढूंढने निकलीं। घने वृक्षों और लताओं से आच्छादित स्थान पर उन्हें मयूर का शव मिला। निराश दमियंती देह का उचित संस्कार कर लौटीं वो निराश थीं। अब न जाने स्वामी का सानिध्य और साथ मिलेगा भी या नहीं या उसी प्रकार उनका मिलाप केवल विधि का एक खेल बनकर रह जायेगा। राजा नल का जन्म अब कहां हुआ होगा? वो उन्हें कभी मानव रूप में पुन: प्राप्त कर भी पायेंगी या नहीं, उनके मन में कई सवाल थे।
वो उपवन से निकल महल के द्वार पर ही थीं कि उनके कानों में माता का हर्षित स्वर पड़ा- स्वामी पड़ी प्रसन्नता का विषय है।
क्या हुआ?
आपके पड़ोसी मित्र राजा के घर में पुत्र का जन्म हुआ है।
अहो कैसे आनंद की बात है?
अब दमियंती का मनमयूर नाच उठा। वो समझ गईं कि राजा नल का मानव के रूप में जन्म हो गया है। वो प्रसन्न होकर कक्ष में चली गईं।
यहां उनके माता-पिता का संवाद जारी रहा।
स्वामी स्मरण कीजिये आपने और उन्होंने वचन लिया था कि हमारे बच्चों की आपस में विवाह कर दिया जायेगा। जिससे यह मित्रता रिश्तेदारी में परिवर्तित हो जायेगी, रानी ये याद दिलवाया।
पर सुनो प्रिये, हमारी पुत्री तो आयुष में उनके पुत्र जो अभी शिशु ही है काफी बड़ी होगी।
वो दोनोंं चिंतित हो गये।
दमियंती भी ये बात समझती थीं उन्होंने कक्ष बंद कर भगवान विष्णु से प्रार्थना की।
हे लक्ष्मीकांत, हे वृंदा के स्वामी, मेरी प्रार्थना स्वीकार कीजिये। मुझे मेरे स्वामी से आयुष में समान कर दीजिये। ताकि हमारा विवाह उचित समय पर हो सके।
कक्ष का कपाट जब बहुत देर तक नहीं खुला तो राजा ने द्वार खोला। देखा तो भगवान के सामने एक शिशु बालिका लेटी हुई है। उन्होंने जब प्रश्र किया कि यह सब क्या है तब बालिका रूपी दमियंती ने जन्मांतरों का वृतांत कह सुनाया। राजा धन्य हो गये।
अब धीरे-धीरे राजा नल और दमियंती युवा हुए और उनका (पुन:) विवाह हुआ।
विवाह के पश्चात जब राजा नल और सोलह श्रृंगार से सज्जित दमियंती मिले तो दमियंती ने झुककर उनके पांच छूना चाहे तो राजा नल ने उनको तुरंत पकड़ लिया।
यह क्या करती हो दमियंती, चरण तो मुझे तुम्हारे छूने चाहिये।
स्वामी क्यों आप मुझे नर्क का भागी बनाते हैं।
नर्क नहीं, तुम तो स्वर्ग से भी उच्च लोक की अधिकारी हो। तुम तो सौभाग्य का श्रृंगार हो देवी।
और आप मेरे सत्रहवें श्रृंगार हैं स्वामी, दमियंती ने कहा।
अब दमियंती से हृदय की बात कहते हुए नल ने कहा, हे सुमुखी तुम्हारी तपस्या से ही मुझे निम्र योनी से उच्च योनी में जन्म प्राप्त हुआ है। तुम अर्धांगिनी नहीं सर्वांगिनी हो।
ऐसा कहकर राजा नल ने दमियंती को हृदय से लगा लिया।
इस कथा से ये ज्ञान प्राप्त होता है कि पत्नी पति को योग्य मार्ग दिखा सकती है और उसे घर को स्वर्ग बना देती है यदि नल अपने पतिव्रता नारी दमियंती की शिक्षा पर चलते तो उनको निम्र योनियों में जन्म लेकर न तो स्वयं कष्ट भोगना पड़ता न ही दमियंती को कष्ट भोगना पड़ा। अत: पत्नी और पति को आपसी समझ हो और वे सत्यव्रती होकर धर्मचारी हों तो उनका घर स्वर्गतुल्य हो जाता है।
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