google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: सूर्य और उनकी तीन अर्धांगिनियां

गुरुवार, 16 जनवरी 2020

सूर्य और उनकी तीन अर्धांगिनियां

भगवान सूर्य की पत्नी का नाम संज्ञादेवी था। सूर्य अपने रथ पर बैठकर सारथी अरुण के साथ पूरे ब्रम्हांड का भ्रमण करते। वो देवी संज्ञा को भी अपने रथ पर भ्रमण करने के लिये आमंत्रित करते पर सूर्य के तीव्र तेजस से उन्हें कष्ट होता था। जब बार-बार कहने पर भी सूर्य ने अपना तेजस कम न किया तो संज्ञादेवी उन्हें छोड़कर चली गईं। अपनी अनुपस्थिति का सूर्य देव को संदेह न हो इस बात को समझते हुए वो अपनी छाया को वहां छोड़ गईं।
छाया देवी बिलकुल संज्ञादेवी का ही प्रतिरूप थीं इसलिये सूर्यदेव को तनिक भी संदेह न हुआ। छाया रूप होने के कारण छाया को सूर्य के तेजस से कष्ट नहीं होता था। छाया ने सूर्य देव के साथ वैवाहिक जीवन का सुखपूर्वक आनंद लिया और ज्येष्ठ पुत्र ग्रहराज शनि, अनुजपुत्र यम और पुत्री यमी या यमुना को जन्म दिया।
एक बार छाया देवी को कामना हुई की मईके होकर आया जाए पर उन्हें संदेह था कि शायद सूर्य देव उन्हें जाने न दें इसलिये वो अपनी छाया स्वर्ण को वहां छोड़कर चली गईं।
स्वर्ण बिलकुल छाया का प्रतिरूप थीं इसलिये सूर्यदेव को संदेह नहीं हुआ। एक दिन बालक शनि स्वर्ण के पास पहुंचे वो भी नहीं जानते थे कि ये छाया नहीं बल्कि छाया का प्रतिरूप स्वर्णा है। उन्होंने कहा- माता भोजन दो क्षुधा लग रही है। इस पर स्वर्णा ने कहा कि सबसे पहले पिता सूर्यदेव भोजन ग्रहण करेंगे तत्पश्चात तुम्हे भोजन मिलेगा। शनि की पिता से शत्रुता थी वो बोले सबसे पहले मुझे भोजन दो पर स्वर्णा ने ऐसा करने से मना कर दिया।
अब शनि को गुस्सा आ गया। उन्होंने स्वर्णा को मारने के लिए पैर उठाया। यह देखकर स्वर्णा को क्रोध आ गया, पापी माता को मारने के लिये पैर उठाता है। जा मैं तुझे शाप देती हूं कि तत्काल ही तेरा पैर सदैव के लिये बेकार हो जायेगा और तू कभी ठीक से चल नहीं पायेगा। दौडऩे की बात ही क्या है? तू मंद गतिगामी हो जायेगा।
तत्क्षण ही शनि का पैर बेकार हो गया। वो घबरा गये। कहते हैं तभी से शनि की गति मंद हो गयी और वो लंगड़ाकर चलने लगे। माता के शाप से भयभीत शनि लंगड़ाते हुए सूर्य के पास पहुंचे और सारा वृतांत सुनाया। सूर्य ने सोचा- संतान कितनी ही निर्लज्ज क्यों न हो जाये। माँ कभी संतान को शाप नहीं दे सकती वो भी ऐसा शाप।
सूर्य तुरंत स्वर्णा के पास पहुंचे और कहा- तुम छाया हो ही नहीं सकती। माता कभी अपनी संतान को घातक शाप नहीं दे सकती। कौन हो तुम अपना पूरा परिचय दो अन्यथा हमारे कोप ही भागी बनो।
अब स्वर्णा घबरा गई। उसने संज्ञादेवी के जाने से लेकर छाया के बनने और फिर उसके जन्म की कथा सुना दी। संज्ञा के बारे में जानकर सूर्य ने तत्काल अपनी दिव्य दृष्टि समूचे ब्रम्हांड में फैला दी और संज्ञादेवी का पता लगाने लगे। उन्हें संज्ञादेवी अश्विनी यानी घोड़ी के रूप में ब्रम्हांड में विचरण करती दिखीं। यह देख सूर्य देव का मन प्रेम से गद् गद् हो गया और वो भी अश्व यानी घोड़े का रूप लेकर संज्ञादेवी के पास जा पहुंचे और सहवास करने का प्रयास करने लगे। यह देख संज्ञादेवी वहां से भागीं उनके पीछे अश्व रूपी सूर्यदेव भी भागे। ब्रम्हांड में एक जगह जाकर संज्ञादेवी थककर रुक गई। सूर्यदेव भी यहां आ पहुंचे और अश्व रूप में उनसे संसर्ग किया। इसपर अश्विनी रूपी संज्ञादेवी ने अपने नथुनों से वायु का प्रबल झोंका छोड़ा जिसके ब्रम्हांड में टकराते ही दो सुंदर बालकों का जन्म हुआ। संज्ञादेवी के अश्विनी रूप में प्रकट हुए ये दोनों बालक अश्विनी कुमारों के नाम से प्रसिद्ध हुए और देवताओं के चिकित्सक बने।
सूर्यदेव संज्ञा देवी को वापस ले आये और उनके कहे अनुसार अपना तेजस कम कर लिया। छाया और स्वर्ण संज्ञादेवी में एकाकार हो गये। इसके पश्चात सूर्यदेव और संज्ञादेवी सुखपूर्वक रहने लगे।
सूर्यदेव और संज्ञादेवी की इस दिव्य कथा को सुनने, जानने और समझने वाले लोगों पर सूर्यदेव और संज्ञादेवी की कृपा बनी रहती है।

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