google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: वानरराज द्विविद की कहानी

शुक्रवार, 22 जून 2018

वानरराज द्विविद की कहानी

त्रेता युग में भगवान श्रीहरि विष्णु के अवतार श्रीराम का जन्म हुआ। श्रीराम को चौदह वर्ष का वनवास मिला। इस वनवास के दौरान लंकेश्वर रावण की बहन शूर्पणखा श्रीराम और लक्ष्मण पर मोहित हो गई और वासनातुर होकर उनके सामने जाकर सहवास का प्रस्ताव रखने लगी। श्रीराम और लक्ष्मण ने उसे मर्यादा की शिक्षा दी पर वो नहीं मानी। बात न मानी जाने को लेकर वे कु्रद्ध हो गई और उसने सुकुमारी सीता पर आघात कर दिया। ये देखकर लक्ष्मण क्रोधित हो गए और अच्छी समझाइश देने के लिए उसकी नाक काट दी। कटी नाक लेकर शूर्पणखा अपने भाई रावण के पास गई और पूरा वृत्तांत सुनाया। लंकाधिपति को क्रोध आ गया और राम-लक्ष्मण को उचित शिक्षा देने के लिए उसने साधु के भेष में जाकर सीता का हरण कर लिया और सीता को लंका लाकर भांति-भांति से प्रताडि़त करने लगा। वन में श्रीराम को हनुमान और सुग्रीव मिले। इनकी सहायता से श्रीराम ने वानरों की एक विशाल सेना तैयार की और लंका जाकर लंकाधिपति रावण का वध करके सीता को मुक्त करवाया। श्रीराम ने जिस विशाल वानर सेना की सहायता ली थी। इस विशाल सेना में महाकपियों की भरमार थी। इन्हींं कपियों में से एक था-द्विविद। द्विविद में दो महावानरों का बल था और इस महाकपि ने रावण के महायोद्धा सेनापति प्रहस्त का वध किया था।
विभीषण को लंकाधिपति बनाकर श्रीराम लौटने लगे तो उन्होंने सभी वानरों को उचित पुरस्कार दिया। द्विविद ने श्रीराम से फिर से मिलने की अभिलाषा प्रकट की। श्रीराम ने द्विविद को वरदान दिया कि वो द्वापर युग में जब श्रीकृष्ण का रूप लेकर पृथ्वी पर लीला करेंगे तब वो उनका दर्शन कर सकेगा। इसके बाद द्विविद तपस्या में लग गए। द्विविद की तपस्या द्वापर में पूरी हुई। जब उनको पता चला कि द्वापर युग आ गया है और श्रीराम, श्रीकृष्ण का रूप लेकर द्वारिका में हैं तो वो द्वारिका की ओर दौड़ पड़े। वो तीव्र गति से द्वारिका जा पहुंचे। द्विविद को देखकर द्वारिका के रक्षकों ने उनको द्वारिका का शत्रु जाना और उन पर हमला कर दिया। श्रीकृष्ण से मिलने को आतुर द्विविद ने उनको पछाड़ा और एक ही छलांग में द्वारिका की विशाल दीवार को फांदकर अंदर चले गए। उन्होंने श्रीकृष्ण को वहां ढूंढने का प्रयास किया। द्विविद जहां पहुंचे थे वहीं कुंज के पास बलराम सोम का पान कर रहे थे वहां कई सुंदरियां भी उपस्थित थीं। श्रीकृष्ण को वहां न पाकर द्विविद क्रोधित हो गया। वो कुंज में जा घुसे। उन्होंने सुंदरियों के वस्त्र फाड़ कर उनको घायल कर दिया। अब बलराम भी क्रोधित हो गए। दो में युद्ध की सी स्थिति बन गई। बलराम ने हल उठाकर द्विविद के सिर पर दे मारा। दूसरी ओर नगर के रक्षक श्रीकृष्ण के पास पहुंचे। श्रीकृष्ण समझ गए कि द्विविद मिलने आए हैं वो कुंज की ओर दौड़े। हल का आघात होते ही द्विविद वहीं गिर गये। श्रीकृष्ण वहां पहुंचे तो उन्होंने बलराम को याद दिलाया कि ये वानरराज द्विविद हैं। उनसे मिलने की बात उन्होंने श्रीराम के रूप में कही थी तब बलराम लक्ष्मण के रूप में थे। अब बलराम चकित होकर शोकाकुल हो गए। श्रीकृष्ण ने द्विविद के सिर को अपनी गोद में रख लिया। श्रीकृष्ण को हाथ जोड़ते हुए इस महावानर ने श्रीकृष्ण की गोद में अपनी गति को पा लिया। 21 जून 2018

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...