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शुक्रवार, 22 जून 2018
हनुमान का वाटिका विध्वंस
देवी सीता ने हनुमान को बहुत आशीर्वाद दिया। आशीर्वाद पाकर हनुमान आनंदित हो गए। अब हनुमान की अभिलाषा रावण को अच्छा सबक सिखाने की थी। वो सीता से बोले- मां मैं बहुत भूखा हूं। वाटिका में लगे सुंदर फलों को देखकर मन चंचल हो रहा है। आप आज्ञा दें तो अपनी क्षुधा शांत कर लूं। सीता को हनुमान के बल और श्रीराम की कृपा पर शंका तो नहीं थी पर अकेले हनुमान और असंख्य निशाचरों के बारे में सोचकर वो चिंतित हो गईं- वत्स, हनुमान इस उपवन की रखवाली असंख्य बलशाली निशाचर यानी राक्षस करते हैं। हनुमान बोले- मां उनका मुझे कोई भय नहीं है, अगर आप प्रसन्न मनस से आज्ञा दें तो मैं फल खा लूं। सीता का मन तो नहीं था पर क्षुधातुर हनुमान को देखकर उन्होंने जाने की आज्ञा दे दी।
हनुमान वहां गए। उन्होंने देखा वाटिका बहुत ही व्यवस्थित थी। विभिन्न प्रकार के फल और सुगंधित पुष्प वहां लगे थे। छाया सुखदायक और भूमि पर कोमल घास थी। पेड़ों-पौधे क्यारियों में लगे थे जिनमें व्यवस्थित रूप से स्वत: पानी की आपूर्ति होती थी। पेड़ों की हरितिमा देखकर ऐसा लग रहा था कि मानों वो वैकुंठवन में आ गए हों। यही नहीं इतने सुखदायक वातावरण को देखकर यहां विभिन्न भांति के पक्षी भी निवासरत थे। इनकी मधुर कूज्य ध्वनि सुनकर मन उल्लासित हो जाता था।
हनुमान ने यहां-वहां देखा भांति-भांति के रंगीन फल देखकर उनका मन प्रसन्न हो गया। वो एक पेड़ के पास गए और फल खाए। फल खाया, स्वादिष्ट लगा तो ठीक अन्यथा उस और अन्य पेड़ों को उखाडऩा शुरू कर दिया। उपवन में शोर सुनकर रक्षकों ने देखा। वो हैरान रह गए। एक विशालकाय वानर पेड़ उखाड़ रहा है। पहले तो उन रक्षकों ने ही हनुमान को भगाने की कोशिश की पर हनुमान ने उनपर वृक्ष और फल फेंकने शुरू कर दिये। इस पर लंका नगर के सुरक्षा प्रमुख वहां आए पर वो भी हनुमान के सम्मुख टिक न पाए। जब सब हार गए तो लंका नगर प्रमुखसेनापति जाम्बुवली को बुलावा भेजा गया। इस समय लंका की राजसभा में लंकापति रावण सभी सभासदों के साथ उपस्थित था। सभा में जाम्बूवली का पिता और लंका का मुख्य सेनापति प्रहस्त भी उपस्थित था। जाम्बूवली हनुमान से लडऩे पहुंचा और उन पर भांति-भांति से प्रहार करने लगा। हनुमान के एक ही प्रहार में जाम्बूवली के प्राण पखेरू उड़ गए।
अब रावण और मंदोदरी के छोटे पुत्र अक्षय कुमार को समस्या बताई गई। अक्षय कुमार वहां पहुंचा पर वो भी हनुमान के आगे टिक न सका और मृत्यु को प्राप्त हो गया। महाबली हनुमान लंकापति को श्रीराम का प्रताप दिखाना चाहते थे। अक्षय कुमार की मृत्यु होते ही सभी समझ गए कि ये महाकपि को सामान्य वानर नहीं है, जो केवल देह से विशालाकार है। ये बुद्धिमान और अतीव शक्तिमान है। ऐसा कोई सामान्य वानर नहीं हो सकता। अक्षय कुमार की मृत्यु का समाचार फैलते ही मंदोदरी शोक से विकल हो गई। अब पूरा प्रकरण रावण और मंदोदरी के बड़े पुत्र मेघनाद के सम्मुख पहुंचा। सभा में रावण हनुमान के बारे में सुनकर आश्चर्य में पड़ गया कि कौन ऐसा प्राणी है जो रावण से बिना भय किए लंका में उत्पात मचा रहा है। उसने मेघनाद से कहा कि वो उस महाकपि (हनुमान) को जीवित पकड़कर लाए। वो ये जानना चाहता है कि महावानर आया कहां से है? (क्योंकि महाप्रतापी वानराज बाली तो मर चुका है तो ये कौन है जो उसे भयभीत करने यहां तक चला आया।)
मेघनाद अक्षय कुमार से अधिक अनुभवी योद्धा था। वो सभी आयुध लेकर उपवन पहुंचा। अब तक उपवन, उपवन न रहकर युद्ध का मैदान हो चुका था। मृतक राक्षसों के देह हटाया जा रहा था और घायल निशाचरों को उचित चिकित्सा के लिए चिकित्सालय ले जाया जा रहा था। यहां-वहां पेड़ उखड़े पड़े थे। मेघनाद ने देखा तो हनुमान वहीं उपस्थित थे। मेघनाद के साथ और अधिक भीषण निशाचर थे। इनको देखकर हनुमान समझ गए कि अब जो आया है वो कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है, पर हां ये रावण को कदापि नहीं है। हनुमान सामने आए और विशाल वृक्ष रथ पर सवार मेघनाद की ओर फेंका। मेघनाद रथ से नीचे कूद गया और इस वृक्ष से वो रथ पूरी तरह से नष्ट हो गया।
महानिशाचर हनुमान की ओर दौड़े तो हनुमान ने उनको अपने शरीर रगड़-रगड़ कर यहां-वहां फेंकना शुरू कर दिया। निशाचरों की हड्डियां टूट गई। ये देखकर मेघनाद उनकी ओर दौड़ा हनुमान भी दौड़े दोनों एक -दूसरे से महागजों की तरह भिड़ गए। अब हनुमान ने एक जोरदार मुष्ठिबांधकर मेघनाद को मारा और उछलकर एक पेड़ पर जा बैठे। घूंसा पडऩे के बाद मेघनाद कुछ देर के लिए बेहोश हो गया। जब उसे होश आया तो वो समझ गया कि इस महावानर को बल ने नहीं माया और आयुध से ही हराया जा सकता है।
मेघनाद ने माया की और कई आयुध भी चलाए पर हनुमान को कोई बांध नहीं पाया। अंत में उसने ब्रम्हास्त्र साधा। यद्यपि हनुमान सहजता से उसे काट देते पर इससे देव ब्रम्हा के नाम से चलाए गए इस आयुध में विराजित प्रजापिता ब्रम्हा का अपमान हो जाता सो हनुमान ने उसका काट नहीं किया। इस आयुध से हालांकि हनुमान को कोई नुकसान नहीं हुआ पर वो बंधन में बंध गए। मेघनाद उनको लेकर रावण की सभा की ओर चल पड़ा। उसे ये नहीं मालूम था कि बंधनों में बंधे हनुमान स्वर्णिम लंका का अंत बनकर आए हैं।
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