google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: तृप्ति

मंगलवार, 13 मार्च 2018

तृप्ति

चंद्रमा की चंद्रिका से शीतल भला क्या हो सकता है? अमृत से महान पय क्या हो सकता है? निवारण से बड़ा सुख और मन की शांति से बड़ा मोक्ष और भला क्या हो सकता है?
पर इन सबसे बड़ा कुछ और भी हो सकता है। एक महान साधु यहां- वहां जाते और लोगों को ज्ञान देते। साधु बड़े विद्वान और तेजस्वी थे। जहां जाते लोगों की भीड़ लग जाती। हर कोई उनके ज्ञान सागर से एक बूंद की अभिलाषा रखता था। इस तरह से वो बहुत अधिक लोकप्रिय भी थे। एक बार वो एक गांव में पहुंचे। पूरा गांव उनके दर्शन को उमड़ा। एक अति साधारण महिला भी अपने पति और गोदीले बालक के साथ वहां जा पहुंची।
साधु ने कहा कि चंद्रमा की चंद्रिका से शीतल भला क्या हो सकता है? अमृत से महान पय क्या हो सकता है? निवारण से बड़ा सुख और मन की शांति से बड़ा मोक्ष और भला क्या हो सकता है? वाह...वाह...लोगों के बीच से आवाज उठी। उस महिला का आदमी एक दम से उठा- नहीं इनसे बड़ा भी कुछ है।
अब साधु की नजर वहां पड़ी। कैसे कह सकते हो...प्रमाण लाओ अन्यथा क्षमा मांगों और चलते बनो। आदमी ने साधु से कहा कि आप मेरे साथ चलो। वो साधु को लेकर चला। पीछे-पीछे लोगों की भीड़ चली। वो चलते-चलते एक झोपड़ों के समूह के बी च आ गए। यहां अर्धनग्र महिलाएं और कंकालकाय बच्चे थे। आदमी ने एक बच्चे को बुलाया। बच्चा आया। सुनों ये साधु महाराज बड़े तेजस्वी हैं जो मांगोंगे मिल जाएगा। बच्चे ने साधु का मुंह देखा- महाराज, आप क्या दे सकते हैं? साधु झेंपे फिर बोले- चंद्रिका...महाराज मेरा तन क्षुधा से तप्त है इसे चंद्रिका क्या शीतल करेगी? अमृत...इन जीवन को जी न पाया तो अमर-अजर होने का लाभ क्या?
निवारण...समस्याओं का अंत नहीं आप तत्काल का निवारण करो तो कुछ बात है...मन की शांति... वो तो कभी नहीं हो सकती महाराज..शायद वो तो आपके मन में भी न हो। साधु कुछ सोच में पड़ गए। उन्होंने झोली से एक रोटी निकाली और बच्चे को दे दी। यहां बहुत से लोग है ऋषिवर आप सभी को तृप्त करें। साधु ने वहां खाना बनवाया और सबको भोजन करवाया।
अब साधु महाराज ने एक ही बात कही सब ज्ञान हो सकता है पर जब तक तृप्ति न हो कुछ भी नहीं सुहाता भले ही धर्म हो कर्म हो। कोई मंत्र-तंत्र तृप्ति नहीं दे सकता। यह संसार भी सत्य है क्योंकि तृप्ति का मार्ग यही से खुलता है। उदराअग्रि जब तक तृप्त न हो कोई वस्तु नहीं उचित जान पड़ती। धर्म और ज्ञान बौद्धिक विलासा है। बुद्धि भी तभी विचार करती है जब उदर से पोषण मिलता है।

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