google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: अंधक का उद्धार

शनिवार, 20 जनवरी 2018

अंधक का उद्धार

एक बार कैलाश पर सुगंधित वायु चल रही थी। वसंत की सी मनोरम ऋतु थी। ऐसा लगता था कामदेव आज संपूर्ण मनोयोग से भगवानशिव और माता पार्वती की सेवा में उपस्थित थे। देवी पार्वती का मन इस सुंदर ऋतु के आकर्षण में बंध गया। भगवान शिव ये समझ गए और देवी पार्वती की मनोदशा जानकर भी मौन रहे। अब देवी पार्वती से रहा न गया उन्होंने उनके समक्ष रमण-भ्रमण करने की अभिलाषा प्रकट की। शिव ने सहमति जता दी। दोनों यहां-वहां भ्रमण करने लगे। देवी पार्वती को एक शरारत सूझी और वो एक वृक्ष के पीछे जाकर निर्गूढ़ (छिप) हो गईं। भगवान शिव ने उनको बारंबार पुकारा फिर एक वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गए। देवी पार्वती चुपके से वहां आईं और शिवजी के नेत्र खेल-खेल में बंद कर दिए। नेत्र बंद होने से भगवान शिव के नेत्रों से अश्रु की बूंदें निकली और धरा पर जा गिरी।
तुरंत ही वहां एक विशालकाय बालक पैदा हो गया और भयंकर चित्कार करके रुदन करने लगा। देवी पार्वती ये देखकर भयभीत हो गईं। स्वामी ये कौन है? ये इस भांति से क्या चित्कार कर रहा है? भगवान शिव गंभीर हो गए- देवी जब आपने मेरे नेत्र बंद किए तब जो अश्रु स्फुटित हुए उनसे इस बालक का जन्म हुआ है। मेरे नेत्र बंद थे इस कारण ये बालक दृष्टिहीन है और कुछ न दिखाई देने के कारण चित्कार कर रहा है। माता पार्वती का हृदय विचलित हो गया। देवी तुम इस दृष्टिहीन बालक की जननी हो, जब तक ये बालक किसी योग्य संरक्षक को नहीं पा लेता तब तक तुम इसका पालन करोगी। माता पार्वती ने इस बालक का पालन-पोषण शुरू कर दिया और नाम दिया अंधक।
दूसरी ओर हिरण्यकश्यप का भाई हिरण्याक्ष वन में भयंकर तपस्या कर रहा था। सिर्फ एक लक्ष्य था देवताओं की पराजय और स्वर्ग पर असुरों का आधिपत्य। तपस्या पूर्ण होने पर उसे ब्रम्हदेव ने उसे मांगा हुआ वरदान दिया। प्रसन्न होकर हिरण्यक्ष जा रहा था कि भगवान शिव देवी पार्वती सहित वहां प्रकट हुए और उसे योग्य जानकर अंधक उसे सौंप दिया।
अब अंधक को पूर्ण नाम मिला-अंधिकासुर। असुरमाता और दादी मां दिति ने अपना पूरा ममत्व अंधक पर उड़ेल दिया क्योंकि अपने दूसरे पाते प्रह्लाद के प्रति उनके मन में विशेष स्नेह नहीं था क्योंकि वो विष्णु भक्त था।
कुछ समय बाद अंधक ने विशालकाय देह को प्राप्त कर लिया पर प्रसन्नता अधिक समय नहीं रहती। हिरण्याक्ष को विष्णु अवतार वराह ने मार डाला और चाचा हिरण्याकश्यप को नृसिंह ने भयंकर मृत्यू को भेंट चढ़ा दिया। राज्य मिला प्रह्लाद को। प्रह्लाद ने दिति और अंधक को रोकने का भरसक प्रयास किया पर दादी मां दिति को संदेह था कि राज्य की भूख मेंं विष्णुभक्त प्रह्लाद अंधक को मार देगा। वो अंधक को लेकर वन में चली गईं और असुरों के कष्टों और उनके अधिकार के देवताओं द्वारा हनन की कहानियां सुनाकर अंधक को तपश्चर्य के लिए प्रेरित किया।
अब असुरों का एकमात्र आशा पात्र था अंधिकासुर। अंधिकासुर ने भयंकर तपस्या की। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रम्हाजी प्रकट हुए- वर मांगों वत्स। अंधिकासुर शिव-शक्तिपुत्र होकर माता पार्वती द्वारा पालित था। वो सिर्फ दृष्टिहीन था मूर्ख नहीं। वो जनता था कि पुत्र कभी भी माता को कुदृष्टि से देख ही नहीं सकता था सो उसने वर मांगा- जब तक मैं अपनी मां को कुदृष्टि से न देखूं मुझे कोई न हरा सके। तथास्तु..... वरदान के प्रभाव से उसको नेत्रदृष्टि भी प्राप्त हो गई। वो प्रसन्नचित्त होकर लौट आया।
अब शुरू हुआ अंधिकासुर का दमनचक्र। विष्णु की पूजा प्रतिबंधित कर दी गई। यज्ञ सहित अन्य धार्मिक क्रियाओं को पूर्णत: रोकने का आदेश हो गया और जो इसकी अवमानना करता कठोर दंड का भागी होता। साधु-संतों को कारावास में डाल दिया गया। भगवान श्रीहरि ने प्रह्लाद को इस बात से पूर्व में ही अवगत करवा दिया था। प्रह्लाद ने राज्य अंधक को सौंप दिया और छली अंधक ने उसे कारावास में डाल दिया।
अंधक ने देवलोक पर धावा बोल दिया और देवलोक असुरों के अधीन हो गया। दिग्विजयी अंधक तीनों लोकों पर शासन करने लगा। अब उसे प्रेरणा हुई कि चलो- सर्वलोक पूजित भगवान शिवशंकर के दर्शन करने कैलाश चलें। वो कैलाश जा पहुंचा। उसने शिव के दर्श न किए। तभी नुपुरों की मधुरआवाज ने उसका ध्यान आकर्षित किया। उसने देखा तो माता पार्वती वहां आईं और शिव के समीप बैठ गई। ममतामयी माता के चेहरे को देखकर उसके हृदय में श्रृंगार रस की उत्पत्ति हो गई। वो वहां से लौट तो आया पर उसके हृदय में केवल और केवल देवी पार्वती का मुखचंद्र स्पष्ट होने लगा। उसने अपना दूत शिवशंकर के पास भेजकर पार्वती देने अन्यथा युद्ध करने की चेतावनी दी। शिवशंकर ने दूत को कहा कि वो अंधक से कह दे कि उसका अंत आ गया है। अंधक वास्तव में अंध हो चुका था। उसने युद्ध की घोषणाकर दी।
युद्ध शुरू हो गया। भयानक वेश वाले भैरव, झोंटिंग (जटा-जूटधारी शिवगण), भूत और चित्र-विचित्र गणों की अमरणशील सेना असुरों से भिड़ गई। ये महायुद्ध था माता के सम्मान का। जब-जब स्त्री के सम्मान पर आंच आती है युद्ध एक धर्मयुद्ध हो जाता है। अंधक लड़ रहा था कि उसे भयंकर वाद्यों की आवाज आई। उसने देखा नंदी पर बैठकर कालों के काल महाकाल स्वयं चले जा रहे थे। भूत- गण उत्तेजित होकर नाच रहे थे। झोंटिंगों ने जटाएं खोल डालीं। भैरवों की आंखें रक्तिम हो गईं। युद्ध अब और भयानक हो गया। अब अंधक और शिव आमने-सामने थे। दोनों लड़े पर अंधक शिव का कुछ न बिगाड़ पाया अंत में वो द्वंद्व युद्ध करने को शिव से भिड़ा तो शिव ने उसे उठाकर फेंक दिया। औंधे मुंह गिरकर अंधक बुरी तरह घायल हो गया। असुर घबराकर भाग गए। शिवसेना ने उसे घेर लिया। शिव त्रिशूल लेकर उसके पास गए।
अब काल जटाएं खोलकर तांडव नाच रहा था। तभी माता पार्वती वहां आ गई- स्वामी इसे क्षमा कर दो। ये हमारा ही पुत्र है। मैं इसकी जननी हूं। आप मेरे सामने मेरे पुत्र का वध कै से कर सकते हैं? मैं इसकी रक्षक हूं स्वामी। अब अंधक के नेत्र खुल गए और वो माता के चरणों में लोट-लोट कर पापों के लिए क्षमा मांगने लगा। मां ने उसे क्षमा कर दिया और उसे शिव गणों में शामिल कर लिया।
माता तो माता ही होती है। उसका ममत्व तीनों लोगों में या किसी भी सृष्टि में बदल नहीं सकता। मां को प्रणाम।।

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