google-site-verification: google29ff83529a400fc5.html संस्कार/Sanskara: श्रीगणेश और यशोदानंदन की परीक्षा

शुक्रवार, 13 जुलाई 2018

श्रीगणेश और यशोदानंदन की परीक्षा

भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी का स्वर मन को मोहित करने वाला और वशीकरण का प्रभाव रखने वाला होता था। जब वो बांसुरी बजाते थे तो स्वर्ग की अप्सराएं, देवियां और समस्त देवगण मोहित हो उठते थे तो मानव की बात ही कहां है?
भगवान श्रीकृष्ण की बांसुरी की विशेषता की चर्चा देवलोक में होती रहती थी। एक बार भगवान श्रीगणेश के पास ये बात जा पहुंची। पार्वती नंदन भगवान श्रीगणेश बिना परीक्षण किये किसी बात को मानते न थे, इसलिए उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की परीक्षा लेने का निर्णय लिया।
देवलोक से योजनों दूर पृथ्वी पर गोकुल में एक दिन ग्वाले गाउओं को चराते हुए आगे निकल गए। मन को मोहित करने वाली सुगंधित शीतल पवन चल रही थी। श्रीकृष्ण ने देखा आकाश में श्याम (काले) मेघ भी आ रहे थे। ये मनोरम दृश्य देखकर वहीं छोटे पर्वत पर बैठकर श्रीकृष्ण बांसुरी बजाने लगे। कुछ समय पश्चात बांसुरी के स्वर को विराम लगा ही था कि गले में मृदंग लटकाकर एक मल्लकाय (पहलवान जैसा) व्यक्ति वहां आया- तू कृष्ण है न। भगवान श्रीकृष्ण उसको देखकर कुछ डरे- हां, पर तुम कौन हो? मैं, हा...हा..हा, मैं हूं मृदंग केसरी...मेरी मृदंग ध्वनि सबका मनहरण कर लेती है। सुना है तेरी बांसुरी भी मनमोहिनी है...चलो मुझ में और तुम में एक प्रतिस्पर्धा हो जाए..याद रहे किसी भी भांति से रुकना नहीं है। भगवान श्रीकृष्ण कुछ समझ गए- चलो...हम तैयार हैं। अब स्पर्धा शुरू हुई।
श्रीकृष्ण जो धुन बजाते। मृदंग केसरी मृदंग पर तुरंत उसका अनुगमन करने लगते। श्रीकृष्ण कुछ परेशान हुए फिर उन्होंने तुरंत स्वर बदलते हुए गजप्रिय ध्वनि में बांसुरी को स्वर दिया। अब मृदंग केसरी मृदंग बजाना भूलकर उन्मत्त-आनंदित होकर गज (हाथी) की भांति नाचने लगा। अहो...क्या आनंद है? बहुत देर तक श्रीकृष्ण बांसुरी बजाते रहे और मृदंग केसरी नाचता रहा। जब आनंदातिरेक (आनंद की अति) हो गया तब श्रीकृष्ण ने बांसुरी बजाने को विराम दिया। अब मृदंग केसरी मुस्कुराया। शिवसुत गौरी नंदन को प्रणाम- श्रीकृष्ण बोले। मृदंग केसरी भी मुस्कुरा कर बोले- यशोदा नंदन श्रीकृष्ण की जय। अब गजमुख गजानन मृदंग केसरी से अपने असली स्वरूप में आ गए। कृष्ण ने श्रीगणेश से पांडवों के हालचाल पूछे। श्रीगणेश ने उनको पांडवों की व्यथा और भविष्य में होने वाली घटनाओं और महाभारत के बारे में भी बताया। इसके बाद श्रीगणेश अपने लोक को प्रस्थान कर गए।

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