यह ब्लॉग धार्मिक और प्रेरक कथाओं के बारे में है। यह ब्लॉग संस्कार, धार्मिक कथा, धार्मिक कथाएं, पौराणिक कथाएं, भारतीय पौराणिक कथा, हिन्दू पौराणिक कथा तथा धार्मिक कथाओं का संग्रह है। This Blog is about Religious and Motivational Stories. It contains sanskar, dharmik katha, dharmik kathaen, pauranik katha, indian mythology stories, hindu mythology, religious stories.
मंगलवार, 3 जुलाई 2018
शकुनि का प्रतिशोध
गुरु द्रोण के आश्रम में किशोरवय दुर्योधन और भीम आमने-सामने हुए तो भीम ने हंसकर दुर्योधन को घट की विधवा का पुत्र कहा और उसका उपहास किया। दुर्योधन सोच में पड़ गया कि वो घट का पुत्र कैसे हो सकता है? वो गांधारी के पास गया और उससे पूरी बात जानना चाही। न चाहते हुए भी गांधारी ने उसे बताया- पुत्र आर्य धृतराष्ट्र से विवाह से पूर्व मेरी कुंडली में ग्रहदोष था इसका निवारण करने के लिए मेरा विवाह एक पानी से भरे मटके से करवाया गया। उसे नष्ट करने के बाद मेरा विवाह आर्य धृतराष्ट्र से संपन्न हुआ।
ये जानकर दुर्योधन का क्रोध चरम पर आ गया। उसने गांधार नरेश सुबल और उसके पुत्र यानी अपने वृद्ध नाना और युवा मामा शकुनि को कारावास में डाल दिया। कारावास में युवा शकुनि और उसके मृत होते पिता दु:ख भोग रहे थे। एक रात सुबल की सांसें उखडऩे लगी। शकुनि उनके प्राण बचाना चाहता था पर वो कुछ भी नहीं कर सकता था। अपने पिता को क्षण-क्षण कष्टमय मृत्यु की ओर जाता देखकर शकुनि का हृदय फटा जा रहा था। वो स्वयं को अशक्त समझ रहा था और व्यथित था। सुबल ने शकुनि से कहा- पुत्र दुर्योधन ने हमारे साथ घोर अन्याय किया है। एक वृद्ध और एक निर्दोष को कारावास देकर उसने महापाप किया है। हमने जो कुछ किया उसमें गांधारी का हित ही था। पुत्र मैं मर रहा हूं पर दुर्योधन के प्रति मेरे हृदय से केवल और केवल शाप ही निकल रहे हैं। पुत्र तुझे इसका प्रतिशोध लेना होगा। प्रतिशोध। शकुनि ने पूछा- वो किस तरह पिताश्री। पुत्र मेरी मृत्यु के पश्चात मेरी उंगलियों की अस्थियों से तुम चौसर के पांसे बना लेना। वो पांसे केवल तुम्हारे इशारे भर से तुम्हारी मनोएच्छा के अनुरूप चलने लगेंगे। ये पांसे ही दुर्योधन का अंत करेंगे। बस, आगे समय तुम्हे स्वयं ही निर्देशित करेगा कि तुमको क्या करना है? इतना कहते हुए सुबल की मृत्यु हो गई। दुर्योधन ने सोचा कि शकुनि का विशेष दोष नहीं है और मातामह (नाना) की मौत से उसको लगा कि इतनी सजा इनके लिए काफी है। इस कांड से दुर्योधन का अपयश भी फैलने लगा सो उसने शकुनि को छोड़ दिया। जैसा सुबल ने कहा था शकुनि ने उनकी अस्थियों से पांसे बनाए। ये पांसे केवल और केवल शकुनि की इच्छा के अनुसार अपना अंक दर्शित करते थे।
जब पांडव और कौरव द्यूतक्रीड़ा (जुआ खेलने) बैठे तो इन्हीं पांसों से शकुनि ने कौरवों को जिताया क्योंकि वो जानता था कि कौरव अधर्म कर रहे हैं और ये अधर्म उनका सर्वांत कर देगा। कौरव ये सोच रहे थे कि वो जीत रहे हैं पर शकुनि जानता था कि ये जीत उनके भावी अंत का सृजन कर रही है।
23 जून 2018
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
खामोश आवाजें भी बोलती है, जब दिल के ग्रामोफोन पर यादों के रिकार्ड के साथ आती हैं। उनका प्यार, उनकी फिक्र हर वो बात जो उनको हमसे जोड़ती है। म...
-
एक बार भगवान शिव और देवी पार्वती दोनों रमण पर निकले। ऋतु आनंद से पूर्ण थी और सृष्टि भी सर्वत्र शांतिमय थी। दोनों प्रसन्न थे। तभी देवी पार्वत...
-
यह कथा विभिन्न धार्मिक कथाओं का आधार लेकर लिखी गई है। हनुमानजी से जुड़ी कथाओं में विभिन्नताओं के चलते विविधता दृष्टिगत होती है। इस कारण कई प...
-
त्रेता युग में काशी क्षेत्र में राजा सौभद्र का शासन था। सौभद्र का भगवान श्रीराम में बड़ा अनुराग था। जब भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हो गया इ...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें